सुनीता असीम

 फूल पर भंवरे तो मंडराए बहुत।

कृष्ण का पर छेड़ना भाए बहुत।

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मानते   उनसे  रहे  थे   दूर  हम।

याद उनकी पर अभी आए बहुत।

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जिन्दगी भर बेकली सी ही रही।

थे अकेले  और  घबराए  बहुत।

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जब चले जाने की बारी आ रही।

सोचकर ये आज पछताए बहुत।

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इक किरण अब आस की है दीखती।

पास कोई  उनके ले   जाए   बहुत। 

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फासले हों दरम्याँ पर बात हो।

हिज़्र तेरा कृष्ण दहकाए बहुत।

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आसरा बाहों का अब तो दे जरा।

कष्ट के  पानी तो  भरवाए बहुत।

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चांदनी सी रात में हम तुम रहें।

दिल मेरा ये सोच शरमाए बहुत।

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मैं पुकारूं तुम चले आओगे क्या।

मूढ़ मति शंका ये करवाए बहुत।

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कृष्ण  तुमसे लो सुनीता मिल गई।

और उसमें तुम तो इतराए बहुत।

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सुनीता असीम

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