कवि जसवन्त लाल खटीक

✍🏻  अप्रैल फ़ूल  


भरी सभा में नेताजी ,
                    अप्रैल फूल बनाते है ।
विकास का आश्वासन देकर ,
                   वोट खिंच ले जाते है ।।


आज के कलयुगी मानव ,
                    अप्रैल फूल मनाते है ।
दो-दो चेहरे लेकर चलते ,
              सबको बेवकूफ बनाते है ।।


भाई-भाई रोज लड़ते ,
                    अप्रैल फूल मनाते है ।
जमीन और दौलत के लिए ,
                   प्राण तक हर जाते है ।।


कलयुगी माँ-बाप देखो ,
                    अप्रैल फूल मनाते है ।
बेटी को जन्म से पहले ,
                  कोख में ही मरवाते है ।।


बेटे भी कम नही आज के ,
                     अप्रैल फूल मनाते है ।
बहु के आते ही माँ-बाप को ,
                   वृद्धाश्रम भिजवाते है ।।


दहेज लोभी सास ससुर भी ,
                     अप्रैल फूल बनाते है ।
बहु को मार देते है और  ,
           आत्महत्या दर्ज करवाते है ।।


भेड़िये रूप में वहसी दरिंदे ,
                     अप्रैल फूल बनाते है ।
बहला फुसला कर बच्चियो को  ,
            हवस का शिकार बनाते है ।।


" कवि जसवंत " करता है अर्जी ,
                 अप्रैल फूल मत बनाओ ।
अपनी क्षणिक ख़ुशी के लिए ,
        दुसरो को दुःख मत पहुँचाओ ।।


कोई टिप्पणी नहीं:

Featured Post

गीत- दिन से क्या घबराना दिन तो आते जाते हैं....... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

गीत- दिन से क्या घबराना दिन तो आते जाते हैं....... चुप्पी  के   दिन खुशियों के दिन भीगे सपनों की बूंदों के दिन, आते जाते हैं, दि...