कविता:-
*"अनदेखी"*
"अनदेखी राहो पर चलना साथी,
सहज़ नहीं होता-
साथी इस जीवन में।
चाही-अनचाही व्यथा मन की साथी,
मिटती नहीं कभी-
स्वयं इस जीवन में।
संग चले जो साथी-साथी,
मिलती राहे-
इस जीवन में।
सत्य -पथ चल कर ही साथी,
होता अपनत्व का अहसास-
साथी इस जीवन में।
सद्कर्म की हो पूजा जब जब साथी,
मिलती सफलता-
अनदेखी राहो पर जीवन में।
अनदेखी राहो पर चलना साथी,
सहज नहीं होता-
इस जीवन में।।"
ःःःःःःःःःःःःःःःःःःः सुनील कुमार गुप्ता
sunilgupta 14-04-2020
"काव्य रंगोली परिवार से देश-विदेश के कलमकार जुड़े हुए हैं जो अपनी स्वयं की लिखी हुई रचनाओं में कविता/कहानी/दोहा/छन्द आदि को व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल साइट्स के माध्यम से प्रकाशन हेतु प्रेषित करते हैं। उन कलमकारों के द्वारा भेजी गयी रचनाएं काव्य रंगोली के पोर्टल/वेब पेज पर प्रकाशित की जाती हैं उससे सम्बन्धित किसी भी प्रकार का कोई विवाद होता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उस कलमकार की होगी। जिससे काव्य रंगोली परिवार/एडमिन का किसी भी प्रकार से कोई लेना-देना नहीं है न कभी होगा।" सादर धन्यवाद।
सुनील कुमार गुप्ता
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