डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

मेरी 5 कविताये


वर दे वर दे मातृ शारदे"
            (चौपाई)


कृपा करो हे मातृ शारदे।
वर दे हे ममता माँ वर दे।।


अभिनन्दन स्वीकार करो माँ।
वन्दनीय हे वन्दनीय माँ।।


सोच समझ हे माँ विकसित कर।
दया सिन्धु हे माँ करुणाकर।।


सबको सम्मति दे हे माता।
हे सुखदाता ज्ञान प्रदाता।।


वेद निपुण हम बनें जगत में।
रहें हम प्रसन्न नित्य स्वगत में।।


बैठी संग रंग भर उर में।
रहो अनवरत अन्तःपुर में।।


सेवा का अवसर दो माता।
सुन्दर सत्व भाव दे दाता।।


शंकाओं को दूर करो माँ।
विपदाएँ भरपूर हरो माँ।।


दल-बल लेकर घर में आओ।
अत्युत्तम रचना बन जाओ।।


वीणापाणी हंसवाहिनी।
संकटहरण शांतिदायिनी।।


हर विकृतियाँ प्रिया अमृता।
भक्तिदायिनी हे माँ ललिता।।


हम मानव को शुभ मधु वर दे।
सदा प्रणम्या  शक्ति शारदे।।


रचनाकार:डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


"कविता हथौड़ी चलाकर नहीं बनती है "


कविता पर हथौड़ी मत चलाओ,
यह लोहा नहीं है।


कविता निरन्तर प्रवाह है,
भावों का बहाव है।


कविता लिखी नहीं जाती,
यह स्वतः लिख उठती है,
अपने आप बह जाती है।


गंगा अपने आप बही हैं,
भगीरथ तो निमित्त थे।


भगीरथ भी चाहिये,
भागीरथी भी चाहिये,
एक साधन तो दूसरा साध्य है,
एक आराधक तो दूसरी आराध्य है।


कविता भी गंगा की तरह ध्येय है,
गेय और अगेय है,
अत्यंत पावनी है,
मधुर फलदायिनी है।


कविता निकलती है,
सुमुखी युवती  की तरह सजती है ,
दुल्हन की तरह खिलती है,
हमेशा निज रूप में चमकती चहकती है,
इत्र की तरह महकती है,
चंचल चितवन से चित -चोरी करती है।


कविता  मूलतः अदेह है,
अभिव्यक्ति में सदेह है।


यह देही है,
साक्षात वैदेही है,
कवि सुता है,
सदा पूजिता है।


इसे कुरेदना मत,
मात देना मत,
यह परम स्वतंत्र है,
आत्मा का कोमल तंत्र है,
स्वाधीन है,
दया और करुणा की सहज वीन है,
परम प्रवीण है,
जीवन का लोक मत है,
सर्व सम्मत है।


इसे वांधो मत,
रहो ध्यानरत,
कभी तो आएगी,
पूरे ब्रह्माण्ड में तहलका मचाएगी।


इसे पीटकर नहीं पाया जा सकता है,
मनो-आत्मिक सहजता से जाना जा सकता है।


रचनाकार:डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


"आध्यात्मिक सन्देश:बुद्ध सन्दर्भ"


            (दोहा )


जन्म नाम सिद्धार्थ ही, कर्म नाम है बुद्ध।
आजीवन करते रहे, विकृतियों से युद्ध।।


मन को माने अति अहं, किये मन-मनन शुद्ध।
मन को जीते प्रेम से, किये वृत्ति अवरुद्ध।।


बुद्धिवाद का ध्वज लिये, फहराइये चहुँओर।
बुद्धि मान्य हर वस्तु का, बने प्रचारक घोर।।


सकल विश्व एकीकरण, में था अति विश्वास।
चाह रहे थे हो नहीं, कोई मनुज निराश।।


आशामयी हो जिन्दगी, आशा का संसार।
आशा की बुनियाद पर, टिके विश्व-परिवार।।


हो सबमें संवेदना, करुणा -सिन्धु प्रवाह।
प्रीति परस्पर की रहे, हर मानव में चाह।।


दया भाव सरिता बहे,हर मानव में नित्य।
सुख-दुःख में सम भाव ही, हो दुनिया में स्तुत्य।।


जैसा जो जिस रूप में, कर उसको स्वीकार।
बदलो खुद को बन सहज, तत प्रतिकूल नकार।।


जीना सबके लिये, है गौतम का धर्म।
इसी भावना में बसे, मानवता का मर्म।।


गौतम बुद्ध विशाल वट, सबके छायाकार।
सकल जगत को हैं दिये, इक छत का उपहार।।


काम क्रोध मद लोभ को, कर विनष्ट बन बुद्ध।
आत्म बोध के जागरण ,से कर जग को शुद्ध।।


सुन्दर संस्कृति सभ्यता, का बन रचनाकार।
जग को अपना प्रिय समझ, रहना नित्य उदार।। 


रहो समर्पित विश्व प्रति, रख सेवा का भाव।
जीना सीखो नित्य नव, हर दुखिया का घाव।


सत्य अहिंसा प्रेम ही, असली है उपचार।
गौतम के इस भाव का ,करते रहो प्रचार।।


गौतम हैं सामान्य नहिं, गौतम दिव्य विचार।
बुद्ध पूर्णिमा ही करे, धरती का उद्धार।।


बुद्ध बनो अति शुद्ध बन, पावनता स्वीकार।
शुचिता के संसार का, करो नित्य विस्तार।।


रचनाकार:डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


"जल्दी भागेगा कोरोना?? "


             (वीर छंद)


क्या लगता है यह आसार, जल्दी भागेगा कोरोना?
लगातार बढ़ रहा है सार, थम जाने का नाम न लेता.,
इसमें छिपी है कितनी शक्ति, दौड़ रहा यह चौतरफा है.,
बहुत घिनौना इसका भाव, छुआछूत का अतिशय प्रेमी.,
नहीं किसी से है परहेज, चाहे जो भी धर्म-जाति हो.,
सारे मानव एक समान, साम्यवादिनी नीति पापमय.,
सारा जग इससे बेहाल, माँ दुर्गा भी चुप बैठी हैं.,
कैसे कम हो इसका वेग, कैसे होगा नष्ट निशाचर.,
दवा कर रही नहीं है काम, खोज चल रही 'इंजेक्शन ' की.,
कब तक होगा अनुसंधान, राम भरोसे नैय्या सबकी.,
' सोशल डिस्टेंसिंग ' का हाल, मत पूछो तो सबसे अच्छा.,
कितना गजब है इसका हाल, मयखाने के देख सामने.,
कोरोना हो गया है फेल, दिखलाई देती शराब बस.,
इसका होगा क्या अंजाम, यह भविष्यकालीन प्रश्न है.,
इस मंजर को देख प्रसन्न, बहुत हो रहा कोरोना है.,
मय-क्रेताओं की इस भीड़,   से अति उत्साहित कोरोना.,
मन ही मन भरता मुसकान, कोरोना का भाग्य जगा है.,
'डिस्टेंसिंग' का खस्ताहाल,कोरोना का प्राणवायु है।


रचनाकार:डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


"उत्तम सृजन "


(दोहावली)


उत्तम सृजन समझ उसे, जिसमें सुन्दर भाव।
बरगद बन देता सकल, जग को शीतल छाँव।।


करता उत्तम सृजन ही, निर्मलता से प्रीति।
सुन्दरता ही केंद्र अरु, मानववादी नीति।।


उत्तम सृजन सराहता, सुन्दरता की चाल।
मस्ताने अंदाज में, करता नृत्य कमाल।।


बोधगम्य रचना सुघर, स्वर्गिक शुभ संकेत।
कवि कबीर के शव्द हैं, तुलसी का है खेत।।


निज उर में पलता सतत, उत्तम सृजन महान।
आत्मबोध का जलद बन, सींचत सकल जहान।।


सुखमय रचना धर्म ही, उत्तम का सन्देश।
मातृ -भूमि से प्रेम का, देता शुभ सन्देश।।


उत्तम सृजन सराहिये, निर्विकार यह लोक।
इसमें शिव संवाद प्रिय, लिपि बद्धित शुभ श्लोक।।


नहीं देह इसको समझ,इसमें जनक विदेह।
वैदेही श्री जानकी, का यह रघुवर गेह।।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


काव्य रँगोली व्हाट्सएप्प समूह रचनाये 7 मई 2020

🔵बुद्ध पूर्णिमा पर एक रचना..


सुनो बुद्ध! तुम कह कर जाते,
मैं सहर्ष ही करती स्वागत।


मुझ पर घर का बोझ डालकर,
चले जगत का भार उठाने।
मेरी पीड़ा सुन न सके तुम,
जा बैठे उपदेश सुनाने।


यशोधरा मैं,भार धरा का,
तुम गौतम से हुए तथागत।1।


वैभव से निर्लिप्त रहे तो
महलों में भी तप सम्भव है।
मन में हो वैराग्य भावना
तो गृहस्थ में जप सम्भव है।


यदि मुझ पर विश्वास जताते,
जोगन बन होती शरणागत।2।


सुनो तथागत! पता लगा है,
नाम तुम्हारा बुद्ध हो गया।
चिंतन से प्रक्षालन करके,
अन्तर्मन भी शुद्ध हो गया।


मुझको भी भिक्षुणी बनाते,
मैं क्यों बैठी रही अनागत।3।


🔵सन्दीप मिश्र सरस
बिसवाँ सीतापुर


कर्मवीर योद्धा
संसार के हर कोने में
छाई विशद महामारी है
कोविड-19 के घातक वार से
लड़ती ये दुनिया सारी है
औषधि न कोई भी काम की
चिंता बड़ी ही भारी है
इससे अगर बचना हमें
रहना समग्र कर तैयारी है
ऐसे विकट हालात में
जब हाथ छूटे हाथ से
दुनिया बचाने चल पड़े
कर्मवीर योद्धा वार से
निज स्वार्थ सुख घर-बार को
पीछे इन्होंने छोड़कर
नित देश सेवा, धर्म में
लगाई है जान समेटकर
मानव जाति के कल्याण में
निज कर्तव्य मान इस काल में
मिलकर सभी हैं जुट रहे
कोई फँसे न कोरोना के जाल में
डॉक्टर, पुलिस, शिक्षक डटे
सफाईकर्मी और नर्सें चलीं
छेड़ा प्रशासन ने अभियान
जागरूक करते वो गली-गली
आओ मिल इनको प्रणाम करें
कर्मवीर योद्धाओं का सम्मान करें
मानवता की ये मिसाल है
कर्तव्य की मजबूत ढाल है
खाओ शपथ मिलकर सभी
नियम न तोड़ेंगे कभी
डॉ. निर्मला शर्मा
दौसा, राजस्थान


दिनांकः ०७.०५.२०२०
दिवसः गुरुवार
विषय --  आनंद के पल
विधाः कविता
शीर्षकः 🤔 काश,ये आनंद के पल❤️
अनवरत अविचल यायावर  जीवन्त पथ ,
संकल्प  रथ  सारथी ख़ोज की रज्जू धरे ,
सुख  - दुःख ,खुशी - गम ज़ख्म ए सितम,
अबाध  द्रुतगति निडर अनज़ान संघर्षरत,
दुर्गम कँटीले ऊबर खाबर भू शिखर निर्झर,
बढ़ चले दौड़ाए अविचल अश्वमेध घोटक,
ध्येय बस केवल  दुर्लभ अनमोल निच्छल,
शान्ति सुख स्मित मधुर ये आनंद के पल।


भागने को तत्पर  अबाध  चंचल  अधीर  मन,
उत्तुंग  अभिलाष  चाहत   लिए   अरमान वन,
इधर   उधर   भुजंग  सम भटकता   हर  झण,
पठन - पाठन ,गाँव  - शहर ,नद ,गिरि - निर्झर,
तरणतारण  घर परिवार चर्च मन्दिरें   मस्ज़िद,
अपनाए तरीके रास्ते  अनगिनत   जिंदगी  के ,
अफ़सोस,क्लान्त श्रान्त अन्वेषक पा न सका,
अनोखे बेहद खूबसूरत  कुदरती ज़न्नत ए नूर,
नायाब ए मुहब्बत  दीदार  ये आनन्द के पल।


जीवन भर सोचा,सब कुछ  किया बस  ख़ोज में,
बन नत विनत अविरत परहित तजा निज चाह को,
दी सुखद खुशियाँ भाई ,बहन,सगे अपने  मीत को,
लुटायी   मुस्कान  अपनों   के  मुखर  सूखे  अधर,
पर न मिल सके सुकून के स्वर्ग सम अनुपम विमल,
तन्मय यतन माँ बाप की सेवन किया तन धन नमन,
किया आतिथेय हृदय पावन सतत गुरु अतिथिगण ,
पर कर न सका खुश किसी को लम्बी इस जिंदगी,
पा न सका आशीष हाथ  स्नेहिल  शर  सुखद क्षण,
पर,हारा नहीं, धीर साहसी बन बढ़ चला रणबाँकुरा,
ख़ोजने शीतल सहज निज मनहर ये आनंद के  पल।


सोचा कहीं खोट होगी स्वयं जिंदगी  के सिक्कों में ,
तरासूँ जौहिरी बन फिर ख़ुद नेक दिली इन्सानियत,
मिली वज़ह आहत मन जख्मों सितम स्वयं गम की,
चाहत थी किसी कोने में छिपी लोग मुझे अच्छा कहे,
विनयी सतत दाता बड़ा कीर्ति  गाथा   जयगान करे,
मैं प्रचेता बन विजेता त्यागी मान दलदल में था फँसा,
भूला स्वयं कर्तव्य को परहित रत मनुज अनुरक्ति को,
अब शान्त मन मिट क्लान्त सब सुकूं मन की  गज़ब ,
आज तन मन विमल प्रमुदित मिले शुभ आनंद के पल।


कवि✍️डॉ.राम कुमार झा "निकुंज"
रचनाः मौलिक(स्वरचित)
नई दिल्ली


गीत---


कुछ मन को इतना किया किसी ने मतवाला।
पी गये सैकड़ों बार हलाहल का प्याला ।।


हर डगर मोड़ क्या पग-पग पर था अंधियारा
था कहीं क्षितिज से दूर भाग्य का हरकारा
हमने संघर्षों में कर्तव्यों को पाला ।।
पी गये सैकड़ों-----


अब आदि अन्त का भी हमको कुछ ज्ञान नहीं
इस जीवन पथ में चलना भी आसान नहीं
जब रक्त जला तो दिया दीप ने उजियाला ।।
पी गये सैकड़ों------


वे क्या रूठे लगता है जग ही रूठ गया
जो साहस था वो कहीं अचानक छूट गया
हर नगर अपरचित लगा हमें देखाभाला ।।
पी गये सैकडों-----


मन-पीड़ा ने रस घोल दिया उर-गागर में
जिसको पी कर जग डूब गया सुख-सागर में
समझा जग ने इस काव्य-कलश को मधुशाला ।।
पी गये सैकड़ों-----


जब-जब अंतस में जीवन का जलजात खिला
जन-जन को *साग़र* मरुथल में मधुमास मिला
इस भाँति गीत की पाँखुरियों में मधु डाला ।।
पी गये सैकड़ों----
कुछ मन को इतना------


🖋विनय साग़र जायसवाल


हलाहल--ज़हर ,विष
क्षितज--ज़हाँ ज़मीं आसमाँ के मिलने का ग़ुमा हो
हरकारा --डाकिया
अंतस -ह्दय ,उर,दिल
जलजात -कमल का फूल
मधु-शहद,अमृत


आसमां में भरे सितारों में।


खोज लेना मुझे हज़ारों में।


****


भूल जाना नहीं हमें.  तुम भी।


याद रखना सदा   दुआओं में।


***


जब मिलूं मैं नहीं कहीं तुमको।


पूछ लेना  पता       हवाओं में।


***


रूह रब की रही      अमानत है।


चैन उसकी मिले        पनाहों में।


***


इक महक की तरह महकना तुम।


फैल  जाना  उड़ी        हवाओं में।


***


घर के तेरे मना रहे.         मातम।


आह जैसे भरी.          कराहों में।


***


हर कदम काल का       पड़ा डेरा।


जिस्म बचता नहीं        लबादों में।


***


सुनीता असीम


७/५/२०२०


******


शब्द ब्रह्म है
************
शब्द से ही पीड़ा
शब्द से ही गम
शब्द से ही खुशी
शब्द से ही मरहम


शब्द से प्रेम
शब्द से दुश्मन
शब्द से दोस्ती
शब्द से ही प्यार


शब्द से ही समृद्धि
शब्द से ही दीनता
शब्द से निकटता
शब्द से ही दूरियाँ


शब्द से ही अर्पण
शब्द से ही समर्पण
शब्द से ही अमृत
शब्द ही विष


शब्द से ही नजदीकी
शब्द से ही दूरियाँ
शब्द से ही शीतलता
शब्द से ही उष्णता


शब्द ही बह्म है
शब्द ही कर्म है
शब्द ही जीवन है
शब्द ही मृत्यु है


*****************
कालिका प्रसाद सेमवाल
मानस सदन अपर बाजार
रुद्रप्रयाग उत्तराखंड
*********************


बड़े है कवि.................


करके असत्य की आलोचना
सत्य प्रदर्शित कर सके
परीक्षा की है उचित घड़ी जब
अभिव्यक्ति कवि दे सके


मान सम्मान की चाह त्यागकर
कटु हलाहल वह पी जाये
पथप्रदर्शक बनकर जगत का
नरमूल्यों के हित जी जाये


कर सके जो निन्दा कुपथ की
बन मानवता का संरक्षक
काटअमानवीय श्रृंखला नर की
बनने न दे समाज भक्षक


कलम निश्चय बड़ी तलवार से
शब्द गहरे होते वाणों से
आदर्श और सिद्धांत मनुज के
अति प्यारे होते प्राणों से


कलमवीरों का धन स्वाभिमान
कवित्त बड़ा है जागीरों से
सूर्य रश्मियों की तो सीमा होती
कवि सोच बडी प्राचीरों से


कर्तव्य मार्ग पर बढ़ जा आगे
हे संस्कारों के सृजनहार
सुख वैभव और समृद्धि से भी
बड़े है कवि काव्य विचार।


सत्यप्रकाश पाण्डेय


*प्यार की डगर*
विधा : गीत


छोड़ दो तुम मोहब्बत करना अब।
ये तुम्हारे बस की बात नहीं।
इसमें त्याग तपस्या ज्यादा है।
तुम इसे शायद कर सकते नही।।
छोड़ दो तुम मोहब्बत करना अब।


मन को मन से मिलना,
तुम्हें आता नहीं।
दिल को दिल से
क्या तुम मिलेगे।
है आगर तुम को
मोहब्बत सचमुच में है।
तो विश्वास करना तुम
सीख लो जरा।।
छोड़ दो तुम मोहब्बत करना अब।
ये तुम्हारे बस की बात नहीं।


है मोहब्बत की डगर
बहुत ही कठिन।
जिस में कांटे ही
कांटे चुभते है।
जो भी इस राह को
अपने लिए चुने।
वो ही मोहब्बत अपनी
पा सकता है।।
छोड़ दो तुम मोहब्बत करना अब।
ये तुम्हारे बस की बात नही।


अपनी मोहब्बत को आबाद करना चाहते हो।
तो स्नेह प्यार को
दिलो में जिंदा रखो।
दोनों के दिल अगर
एक हो गए है।
ऐसी मोहब्बत ही दुनियाँ में अमर हो जाती है।।
छोड़ दो तुम मोहब्बत करना अब।
ये तुम्हारे बस की बात नही।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)
07/05/2020


*कॅरोना तंत्र।बचो और बचाओ*
*ही है मंत्र।*


लॉक डाउन बढ़ा  दिया है
पुनः अब     सरकार   ने।
बेमतलब बेवजह   कतई
न निकलें आप बाजार में।।
घर पर ही रह  कर  आप
दे सकते कॅरोना को मात।
बस अभी हंसी खुशी वक्त
आप  बिताइये परिवार में।।


स्वास्थ्य ही धन है कि यह
बात दुबारा जान लीजिए।
अभी घर रहने  में भलाई
बस यही   ज्ञान   दीजिए।।
कॅरोना के   साथ  चलना
रहना हमें  सीखना होगा।
अनुशासन     अनुपालना
का बस अहसान कीजिए।।


लॉक डाउन की  रियायत
का कोई दुरुपयोग  न हो।
बेवजह न निकलो  बाहर
कि कॅरोना से योग न  हो।।
मत जाओ     कि   जहाँ
जमा हों   बहुत से  लोग।
मत एकत्र   करें   सामान
ज्यादा कि यूँ ही रोग न हो।।


फांसला बना   कर   रहना
आज हमारा यही  कर्म  है।
कॅरोना   काल में  यही  तो
अब   सर्वोपरि    धर्म    है।।
दूरी मजबूरी नहीं  ये तो  है
आज समय  की    जरूरत।
वही बचेगा जीवित अब कि
समझ लिया जिसने मर्म है।।


*रचयिता।एस के कपूर " श्री हंस*"
*बरेली*।
मो     9897071046
         8218685464


बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं
7.5.2020


बुद्ध कर त्याग क्या पाया तुमने
जो यशोधरा ने न पाया कर्तव्य निभाते हुए
कर्मनिष्ठ रहते सन्यासी होना बहुत कठिन है
त्यागना तो सरलतम पथ है जीवन का।


जिस सच को तुमने आत्मसात किया भ्रमण में
यशोधरा ने उसे पाया पुत्र पालन राज्य संभालने में।


संसार को देखा जिस दिव्य दृष्टि से तुमने
यशोधरा ने  निर्बाध निभाया रह महलों में ।


सिद्धार्थ बुद्ध बनने की तुम्हारी यात्रा बहुत कठिन थी
जो सहजता से आत्मसात हो गई यशोधरा में ।


न कोई *भय* न ईर्षा न दुःख न सुख न राग न द्वेष जिन्हें जानने का  यत्न किये तुमने
ये पथ यशोधरा को मिल गया सहजता में ।


तुमने पाया जो ज्ञान एक नारी की खीर में बोद्धि वृक्ष के नीचे
उसे यशोधरा ने पाया राहुल सँग *बुद्धम् शरणम् गच्छामि में*


स्वरचित
निशा"अतुल्य
🙏🏻😊


बंद थे किवाड़े खोल दिये गये
जहर हालात में घोल दिये गये
बंद थे किवाड़े खोल दिये गये


हुकमरां की फरमान ऐसी थी
शराब नस नस में घोल दिये गये
बंद थे किवाड़े खोल दिये गये


मिट रही जान एक एक कर
जान सस्ती थी मोल दिये गये
बंद थे किवाड़े खोल दिये गये


सवालात बहुत उठे बेनज़ीर से
जवाब सिर्फ गोल गोल दिये गये
बंद थे किवाड़े खोल दिये गये


गरीबी पूछनी है हम से पूछो
रोटी के खातिर झोल दिये गये
बंद थे किवाड़े खोल दिये गये


Priya Singh


नमन मंच
विधा-छंद मुक्त
*रिक्त स्थान*
मेरे आंगन की तुलसी,
हरी भरी लहलहाती,
वर्षा, ग्रीष्म,शीत सहती,
पर कभी कुछ ना कहती।


वो नीम जो द्वार पर खड़ा है,
क ई पीढ़ियों का हमसफ़र रहा है,
ठंडी छांव में टहनियों पर झूला करते थे,
बूढ़ा हो चला वो अब,
सिर्फ अब पत्ते झड़ा करते हैं।


पीपल तुम्हें तो हम पूजते है,
तुम अब सिर्फ़ मंदिरों में ही दिखते हो,
बाग बगीचे तुम बिन सुने हैं,
याद है मुझे हम "दादा"कहा करते थे तुम्हें,
अब ना घर में "दादा" दिखते,ना ही चौबारों और त्रिवेणी में।


कितने स्वार्थी हो गए आप हम,
जिनके प्रेमाश्रय में पले बढ़े,
उनके लिए घर आंगन में नहीं है जगह,
क्योंकि कंटिले पौधों ने रिक्त स्थान भर दिया है।
ममता कानुनगो
इंदौर


" कुरुक्षेत्र का समर"
कुरुक्षेत्र का वह भीषण समर
अधर्म पर धर्म की जय की डगर
पांडवों ने कृष्ण संग है किया
शंखनाद धर्म का आरम्भ किया
अधर्म के गरल का पान किया
धरती को पाप से मुक्त किया
धरती पे शांति बनी रहे
हानि न जन-धन की करें
धर्म, धैर्य, सहनशीलता
का सदैव पालन किया
रोका बहुत इस युद्ध को
भेजा सन्धि हेतु दूत प्रबुद्ध को
लेकिन समय गति न रुकी
प्रारब्ध की घटना घटी
उस अहंकारी का था अहंकार बड़ा
नेत्रों पर उसके अज्ञान का पर्दा पड़ा
सत्ता की चाह में वह दुर्मति
अन्याय सदा करता रहा
नीति का जब प्रतिकार हो
अन्याय की जय जयकार हो
दुर्जन का हो जयघोष जब
अट्टहास कर अनीति का नाद हो
जब पाप का भरता घड़ा
होता काल उसके सिर पर खड़ा
कुरुक्षेत्र की इस भूमि में
केवल धर्म ही सुरक्षित खड़ा
जगदीश की आज्ञा से तब
कौन्तेय ने गांडीव धारण कर
धर्म रूपी शर सन्धान किया
अधर्म का धरती से नाश किया
डॉ. निर्मला शर्मा
दौसा राजस्थान


*"छोड़ो कल की बात"*
     (सरसी छंद गीत)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
विधान - १६ + ११ = २७ मात्रा प्रतिपद, पदांत Sl, युगल पद तुकांतता।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
*खुशियाँ लाओ दूर करो तम, पाओ पुण्य-प्रभात।
उज्ज्वल-उत्तम कर लो दिन को, छोड़ो कल की बात।।


*लाभ नहीं इनको अपनाकर, ढोंग-रूढ़ियाँ-रीति।
लक्ष्य भेदने मिल-जुल कर सब, अपनाओ नव-नीति।।
छायी थी जो काली छाया, भूलो वे दिन-रात।
उज्ज्वल-उत्तम कर लो दिन को, छोड़ो कल की बात।।


*आज लिखेंगे आओ मिलकर, अमल-नवल इतिहास।
पल-पल पावन पथ पर पसरे, परिमल परम प्रभास।।
आस जगाओ, हाथ बँटाओ, झूमें अब दिन-रात।
उज्ज्वल-उत्तम कर लो दिन को, छोड़ो कल की बात।।


*नयी कहानी नित गढ़ लेंगे, होंगे जब सब साथ।
पूरे होंगे सपने सारे, उन्नत होगा माथ।।
नूतन जागृति लाओ आओ, सँवरे सुख-सौगात।
उज्ज्वल-उत्तम कर लो दिन को, छोड़ो कल की बात।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
भरत नायक "बाबूजी"
लोहरसिंह, रायगढ़(छ.ग.)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^


कृष्ण भक्ति कों पान कर,
भर जीवन में मोद।
क्षमा करें अपराध सब,
लेंगे अपनी गोद।।


जन्म लाभ निश्चय मिले,
करो कृष्ण से प्रेम।
राधे के आशीष ते,
निश्चित जीवन क्षेम।।


मनमोहन सा जगत में,
ना कोई दातार।
मुक्ति चाहते कष्ट से,
करो श्याम से प्यार।।


श्री कृष्णाय नमो नमः


सत्यप्रकाश पाण्डेय


😌    कोरोना और हम   😌


जीना  होगा  अब  हमें,
                     'कोरोना' के साथ।
कोशिश हुई बहुत मगर,
                     नहीं छोड़ता हाथ।
नहीं  छोड़ता  हाथ,
                   साथ ये रहना चाहे।
मज़बूरी   में   यार,
               चलो अब संग निबाहें।
अब तो हमको घूॅ॑ट,
               ज़हर  ही  होगा  पीना।
घर में रहकर बंद,
              कहाॅ॑  है  संभव  जीना।


    । राजेंद्र रायपुरी।।


*हमारी गौ माता*
***************
हिन्दुओं काआत्म गौरव गाय ही है,
धर्म ग्रंथों में दिया है इसको सम्मान है,
इसी के दूध से श्रृंगी ऋषि ने,
खीर बनाई थी और हुआ राम जन्म।


गौ हमारी पूज्य माता सदा से,
मानव का दिव्य नाता है सदा से,
इसके दूध से औषधि बनती है
जो रोगों से मुक्ति दिलाती है।


मां तो हमें बचपन में ही दूध देती है,
प्यार से हमारा माथा चूम लेती है,
गाय तो सारी उम्र अमरित  देती है,
इसी लिए हर किसी की चहेती है।


गौ माता तो ममता का भंडार है,
जिस घर में गौ रहती है,
पूर्वज भी  प्रसन्न हो जाते है,
इसी लिए गाय देवी देवताओं से भी बड़ी है।।
*******************
कालिका प्रसाद सेमवाल
मानस सदन अपर बाजार
रूद्रप्रयाग उत्तराखंड


काव्य रंगोली आज के सम्मानित रचनाकार

 डॉ. सरला सिंह "स्निग्धा"*
-जन्मतिथि-04अप्रैल
- पति का नाम ----  श्री राजेश्वर सिंह
- स्थायी पता --- 180ए पाकेट ए-3 ,मयूर विहार फेस 3 ,दिल्ली 96
5- फोन नं.-----9650407240
- जन्म एवं जन्म स्थान--- ग्राम-बलुआ पोस्ट-
मलिकपुर,जिला-सुल्तानपुर (यू.पी.)
 शिक्षा----------बी.ए.,एम‌.ए.(हिन्दी साहित्य),बीएड., पी-एच. डी.
- व्यवसाय-------- शास. शिक्षिका


- प्रकाशित पुस्तकों की संख्या एवं नाम__
प्रकाशन __"काव्यकलश","नवकाव्यांजलि" " "स्वप्नगंधा" सभी साझाकाव्य संकलन
1-"जीवनपथ"तथा 2-"आशादीप"एकल काव्यसंग्रह  , 3-"जीवन का समर" कहानी संग्रह 4-''पौराणिक प्रबंध काव्यों में पात्रों का चरित्र ।" शोधग्रंथ
कविताओं का यूथएजेन्डा,नये पल्लव, काव्यरंगोली तथा गुफ्तुगू जैसी प्रसिद्ध साहित्यक पत्रिकाओं में प्रकाशन ।
   दैनिक पत्रिकाओं यथा दिल्ली हमारा मैट्रो,
उत्कर्ष मेल आदि में नियमित प्रकाशन ।
   फेसबुक तथ व्हाट्सएप से जुड़े साहित्यिक
ग्रुपों में नियमित रूप से कविताएँ भेजना ।
 
अनुराधा प्रकाशन दिल्ली ।


लेखन का उद्देश्य-सामाजिक विसंगतियांं दूर करना ।
- प्राप्त सम्मान की संख्या यदि 10 से अधिक हैं तो 10 का विवरण दें-
सम्मान -अनुराधा प्रकाशंन द्वारा 1-साहित्य श्री
सम्मान ,2-महिला गौरव सम्मान ,3-साहित्य सागर द्वारा युगसुरभि सम्मान ,माण्डवी प्रकाशंन द्वारा
-साहित्य रत्न सम्मान आदि ।
 कविताएं
1- पीड़ा (गीत)
             -------------


       शाम खिली  निशा आई 
      चाँद लिखे कथा  पीड़ा।
      झरे चांदनी निर्मल अमित
      मन मयूर करता क्रीड़ा।
      
       चांदनी में मधुर मधुर
       मिलकर मन डोले।
       चार बातें प्रीत भरी
       मधुर मधुर वचन बोले।
      चितवन की वे स्मृतियां
       याद आते वे  नैना।
      मधुमास मधुवाणी वो
      है निशब्द आज बैना।
      सदा साथ निभाना है
      लेते आज यह बीड़ा।


     आकुलमन विचलित लगे
      हैं समक्ष कैसी घड़ियां।
     कठिन पंथ दुष्कर लगें
     नयननीर लगी झड़ियां।
     शत्रु खड़ा सामने ही
     मनुज हाथ मले डोले।
     हृदयमध्य कितने बातें 
     डोले आज बिनु बोले।
     शाम खिली  निशा आई 
     चाँद लिखे कथा  पीड़ा।


      दग्ध हृदय मध्य सोया
      आक्रोश पिये है अनल।
      मनुज रचित ये कर्मबीज
      फलित आज बनके गरल।
      मनुज पर ही टूट पड़ा
      मानव का ही ये करम।
      बादल से छाये पड़े
      टूटे अब सारे भरम।
      साफ स्वच्छ पटल हुआ
      डोल रही जगत पीड़ा।


   डॉ सरला सिंह स्निग्धा
   दिल्ली


         2- व्याधियां(गीत)
        -----------------


जीवन थमा सा लग रहा 
आंख से निद्रा भी भागे।
अजब-सी पीड़ा जगी है
लग रहे सब हैं अभागे।
 
नहीं कह सके है कोई
दोषी आज भगवान को ।
कैसी आयी विकट घड़ी
है झेलनी जो मनुज को।
साथी अपने खोते नित
हाथ मलता है खड़ा वो।
सर्वोच्च भी हाथ बांधे
सामने दुश्मन अड़ा जो।
दुर्भाग्य सा खड़ा सामने
परमशत्रु है आज लागे।


बारूद बम सब  डरे हैं
दौलतें सब तुच्छ दीखीं।
चांद मंगल सब हैं हंसते
मनुज ने क्या बात सीखीं।
कोरोना निर्माण करके
स्वयं ही तो मौत चुन ली।
खुद बना अपना शिकारी
अपने लिए जाल बुन ली।
कांटा बना सबके पथ का
जग इससे निजात मांगे।


रोग से मर रहे कुछ तो
मर रहे कुछ भूख से भी।
राजा भी अब रोता है
गजब का दिन दिखा ये भी।
डरे-डरे घर में छिपते
स्वजनों से विलग होकर।
कैसे कटेगा दिन भला 
खा रहे जो आज ठोकर।
व्याधियां हंसने लगी हैं   
सो रहे दिन रात जागे। 


डॉ सरला सिंह स्निग्धा
दिल्ली



      3- समयगति(गीत)
         **********
मेह बरसेंगे यहां फिर 
उष्णता भी है जरूरी।
देखा यह सदियों से ही
निशा बिना न दिवा पूरी।


बसंत भी आता यहां है
चलके पतझड़ के नीचे।
जलप्रलय ले तांडव गहन
बन उपवन वो ही सींचे।
प्रलयंकर हर कालखण्ड 
दुनिया  जीवन भी पाये।
कठिन घड़ी ये जो आयी 
कल मधुरिम दिन भी लाये।
धरा यह  फिर से सजेगी
आज जो लगती अधूरी।


जीवन है ये छीज रहा 
बिछड़ रहे कितने सारे।
किसी ने मां बाप भाई,
अरु किसी ने पुत्र हारे।
विडम्बना बस है इतनी
यह किया मनुजात का है।
उनको नहीं था ध्यान ये
दोष क्या नवजात का है।
सहज होगा फिर सभीकुछ
आज धर मानव सबूरी।


विश्व कांपता ये थर थर
आज के दिन हैं रुलाते।
छूट जाती गोलियां  जो
वापस कब उनको पाते।
इसका किया उसका किया
किया तो ये मनुज का ही।
अब अज्ञात पथ पे चलते
बिन मंजिल चलते राही।
सृष्टि का विस्तार होगा
रिक्तपन अब फिर जरूरी।


डॉ सरला सिंह स्निग्धा
दिल्ली
          
          4-माँ शारदे!(कविता) 
          -------------------
    मेरे शब्दों में ऐसी शक्ति दे माँ,
    मनभावन मधु्पूरित हो जो ।
    क्षमता हो जिसमें नवचेतना का,
    संसार को नवपथ दे सके ।
    जीवन को दे सच्ची दिशा ,
    भ्रमितो को उनकी राह दे ।
    माँ शारदे ,कर दे कृपा !
    मेरे शब्दों में ऐसी शक्ति दे माँ ।
    अमृतभरे शब्दों से ऐसा जोश हो,
    हारे थके पथिको  में भी ,
    नवउल्लास का संचार हो ।
    भूले है पथ अपना हैं जो,
    उनको उन्हें उनका सही पथ मिल सके।
    सत्पथ पर चलें मानव सभी 
    रामराज्य का पुनः अवतार हो ।
    कलुषित कुटिल जायें सुधर ,
    उनमें नवचेतना का संचार हो ।
    मेरे शब्दों में ऐसी शक्ति दे माँ ।
    माँ शारदे ,कर दे कृपा ।
    हे जगतमाता महारानी, हेजगदम्बिके,
    नारी को मिले  सम्मान उनका ,
    पीड़ित रहीं सदियों से जो ।
    संसार में नव ज्ञान का संचार हो ,
    मेरे शब्दों में ऐसी शक्ति दे माँ ।
    माँ शारदे ,कर दे कृपा ।
    
    डॉ. सरला सिंह "स्निग्धा"
    दिल्ली


            5-  किसान (कविता)


         खटता है दिन रात खेत में
           माथे पर श्रमबिन्दु घनी।
         शीत घाम संगी साथी हैं
            देह दिखे कीचड़ में सनी।


          धरती की सेवा करता है
             अन्न उगाता फिर उससे।
          बहा पसीना अपना चाहे
             जीवन सबका ही सरसे।
          शीत लहर या लू चलता हो
            योगी सा दिन-रात डटे।
          धरती का प्रिय पुत्र सरीखा
             अपने कर्म से नहीं हटे।
          विपरीत समय आड़े आती
             उससे रहती कभी ठनी।


          साथ लगी बरसा रानी भी
            खेतों में खुशियां बरसे।
          नहीं कोई रह जाये भूखा
            भोजन को न कभी तरसे।
           खुशियों के है गीत सुनाती
             कृषकों के बल पर धरती।
           उनके श्रम के मोती से ही
             जन-जन की पीड़ा हरती।
           टपक रहा था जब श्रम तन से
             रोटी का आधार बनी।


            नदियां उसको जल देती हैं
               मलय पवन पंखा झलता।
            सूरज अपनी किरणें देता
               चांद साथ में है चलता।
             वन्दनीय है कृषक सदा ही
                जगती को जीवन देता।
             जीवनदाता के सम लगता 
                अन्न उगा जगती सेता। 
              सदा उगाता मोती माणिक
              कोई नहीं उस सा  धनी।


      


काव्य रंगोली व्हाट्सएप्प समूह 5 एवम 6 मई की चयनित रचनायें

*गुरु चरणों की कृपा*
******************
मन से गुरू की पूजा करो,
हो जाओगे भव सागर पार,
श्रद्धा भक्ति  रखो भावना,
हो जायेगा   कल्याण।


गुरु ज्ञान से कर रहे,
हम सब का कल्याण,
मन में निर्मलता रखो,
हो गुरु कृपा से कल्याण।


गुरु है गंगा ज्ञान की,
सुख देते है भरपूर,
जितना गहरे जा सको,
उतने  हो    मशहूर।


गुरु शरण में ही मिलता है,
शिष्य  को   सद्    ज्ञान,
प्रेम होय गुरु शिष्य में,
जैसे दीपक  में   तेल।


आखर  रचती है लेखनी,
शब्द  रहे   मन आय,
गुरु कृपा जिसको मिली,
वह शिष्य शब्द दरशाय।


मीठी वाणी बोलिए,
हो जग में   गुणगान,
गुरु चरणों में सौंप दो,
यह जीवन की डोर।


गुरु की महिमा क्या बताऊं,
गुरु बिन जीवन सूना है,
गुरु चरणों में यदि प्रेम न हो,
तो मानव जन्म है शून्य।।
*******************
कालिका प्रसाद सेमवाल
मानस सदन अपर बाजार रूद्रप्रयाग उत्तराखंड



🌷यशवंत"यश"सूर्यवंशी🌷
       भिलाई दुर्ग छग



🥀छ.ग.  दोहा🥀



फदके जेकर तरपवाँ,चिखला हाबय पोठ।
धोलव पहली गोड़ यश,हेरव मन के खोठ।।



🌷यशवंत"यश"सूर्यवंशी🌷
       भिलाई दुर्ग छग


विधा-ताॅंका
विषय-घर
5+7+5+7+7=31


सुरक्षा तुम,
अपनापन प्रेम,
सुखद छाया,
वटवृक्ष सा पूर्ण ,
एहसास हो तुम।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
जाने कितने,
सुख दुख के पल,
परिवार के,
साथ मे मिलकर,
आशीष बना साया।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तुम साथी हो,
हमराज हो मेरे,
अकेलेपन,
उदासी में दुआ हो,
मेरा संसार *घर*
🌹🌹🌹🌹🌹🌹


 *घर* आंगन,
 तुम  ही हो स्पंदन,
किलकारीयां,
 ममत्व, आशीर्वाद,
के साक्षी बने तुम।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
द्वार तोरण,
शुभोत्सव के साथी,
हर आहट,,
तुमसे टकराती,
हमे छू भी ना पाती।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹


परिवार से,
मकान बने *घर*
शुभकामना,
से फलता है *घर*
प्यार में पले *घर* ।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
ममता कानुनगो इंदौर


पुत्र धर्म निभाये*
विधा : गीत
(तर्ज: क्या मिलिये ऐसे लोगो से....)


कितनो के पुत्र आजकल,
करते मां बाप की सेवा।
सब कुछ उन पर लूटकर,
खुद बन जाते है भिक्षुक।।
और पुत्र इन सब का, 
कैसे अदा करते है कर्ज।
भेज उन्हें बृद्धाश्रम में,
फिर भी कहलाते पुत्र।।


कलयुग की महिमा तो देखो,
बिना फर्ज भी पुत्र बने रहते।
क्या ऐसे पुत्रो को भी,
पुत्रो की श्रेणी में हम रखे।
पुत्र मोह को त्याग करके,
अपने आप में जीना सीखो।
तभी स्वाभिमान से हम,
जिंदगी को जी पायेंगे।।
कितनो के पुत्र आजकल,
करते मां बाप की सेवा।
सब कुछ उन पर लूटकर,
खुद बन जाते है भिक्षुक।।


पुत्र यदि तुम सही में हो तो,
पुत्र धर्म तुम निभाओ।
बनकर श्रवणकुमार जैसे तुम,
माता पिता की सेवा करो।
तभी तुम कलयुग में भी,
सतयुग जैसे पुत्र कहलाओगे।
सेवा भक्ति उनकी करके,
उनके पुत्र बन पाओगे।।
कितनो के पुत्र आजकल,
करते मां बाप की सेवा।
सब कुछ उन पर लूटकर,
खुद बन जाते है भिक्षुक।।


पुत्रवधु को भी कर्तव्य,
पुत्र निभाने नहीं देते।
झूठी शान की खातिर,
रिश्तों से दूर कर देते ।
ऐसे पुत्र और पुत्रवधु को,
उनके बंधन से मुक्त करो।
छीन के उनके हक को,
उन्हें पद से मुक्त करो।।
कितनो के पुत्र आजकल,
करते मां बाप की सेवा।
सब कुछ उन पर लूटकर,
खुद बन जाते है भिक्षुक।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)



तुमको जिन्दा....


फिर शूल घौपा माँ की छाती में
पांच पुत्रों का दिया बलिदान
कब तक खूनी खेल खेलेगा तू
कब बाज आयेगा सुअर शैतान


खुद के राष्ट्र की परवाह नहीं है
तू सह रहा है भुखमरी की मार
नहीं है कुत्ते जैसी औकात तेरी
सिंहनी जायों से करता टकरार


बहुत झेल लिए आतंकी हमले
लहूलुहान हुई माता की छाती
हमारे धैर्य की नहीं लो परीक्षा
बदतमीजी अब और न भाती


वसुधैव कुटुम्बकम भाव लिए
हमने तो दुश्मन भी अपने माने
भारत माँ की आड़ में पलकर 
तू रहता है कायर सीना ताने


भारत माँ का पावन आंगन
अब हम रक्त बहाने नहीं देंगे
क्षमा भाव न कमजोरी समझो
तेरे दांत विषैले तोड़ हम देंगे


राष्ट्र भक्त हम सिंहनी के जाये
न अपमान सहन कर पायेंगे
अब माँ के दामन में छींट पड़ी
तो तुम्हें जिंदा ही दफ़नायेंगे।


सत्यप्रकाश पाण्डेय



जय माँ शारदे


पंचचामर छंद 



पराग की सुगन्ध ये बिखेरती हवा चली , 
समीर की सुनी पुकार झूमने लगी कली। 
अनंग ने किया कमाल पुष्प नाचने लगे , 
हुआ प्रकाश देख के मृणाल पंक में जगे। 


संदीप कुमार बिश्नोई " रुद्र "
दुतारांवाली अबोहर पंजाब



छद्म युद्ध अब बन्द करो,
कायर पाकिस्तानी गद्दारो।।
भारत माँ के वीर सिपाही,
 घर मे घुस-घुसकर मारो।।


बहुत हो चुका धैर्य,धर्म अब,
अग्नि बाण का करो प्रहार।
नष्ट करो इसका समूल अब,
प्रचण्ड काल बन करो संहार।।


भ्राति-भाव,बंधुत्व भाव का,
अब अपना रुख बदलो।
जो दंश दे रहे रोज देश को,
उन सर्पो का फन कुचलों।।


फहराओ अब ध्वजा पताका,
पाकिस्तानी धरती पर।
दफना दो कायरो को अब,
उनकी शैतानी धरती पर।।


पाँच वीर शहीद हो गये,
हिन्द देश पर कर सब अर्पण।
आशुतोष,राजेश,अनुज ने।
यज्ञ वेदी मे सर्वस्व समर्पण।।


श्वेत कपोत नही भेजो अब,
ये कायर अत्याचारी है।।
पीछे से आघात कर रहे,
भेड़िये ये व्यभिचारी है।


व्यर्थ नही होगा बलिदान,
गौरव करता देश महान।
हंदवाड़ा की अमर शहादत,
याद करेगा हिन्दुस्तान।।


यही निवेदन देश कर रहा
पाक को अब ना माफ करो।
गर्जन करते टूट पड़ो समर मे,
आतंकियों को साफ करो।।
✍आशा त्रिपाठी



शोर करने से जो तन्हाई चली जाती है।
खूब पढ़ने से भी बीनाई चली जाती है।
***
बात मतलब की करे सिर्फ सभी से कोई।
ज्ञान से उसकी शनासाई चली जाती है।
***
बोलकर झूठ मुहब्बत तो नहीं है होती।
इस तरह इश्क की सच्चाई चली जाती है।
***
बेचकर गहने पुराने भी नहीं कुछ मिलता।
लाभ से ज्यादा तो तुड़वाई चली जाती है।
***
जब गवाहों ने कभी लांघी समय की  सीमा।
फिर अदालत की भी सुनवाई चली जाती है।
***
सुनीता असीम
५/५/२०२०


प्रेम में पागल ये आदमी क्यो़ है ,


प्रेम के बस में भगवान क्यों है , 


खाये थे कभी सबरी के बेर ,


राम ने भोगा बनवास क्यों है ,


सब कुछ प्रेम से ही पा लिया है ,


हे प्रभु फिर भक्त आपका भी 


आज इतना परेशान कर्मों है ,



कैलाश , दुबे ,


सिसक रहे हम छुप छुपकर 


सिसक रहे हम छुप छुपकर, 
अब हाथ जले तो क्या रोना।
वह सूरज है रौशन करता, 
इस जग का सब कोना कोना।


हम मानव इस देव भूमि को, 
तपोभूमि न कर पाऐ।
लेकिन हरियाली धरती की, 
बर्बाद सदा करते आऐ।
शुरु हुआ विनाश मनुज का, 
सिसक रहे हम छुप छुपकर।


यह सूरज चाँद सितारे सब, 
उसकी धुरी पर घूम रहे। 
एक सर्वमान शक्ति उसकी, 
उसके कदमों को चूम रहे।
घायल हुआ गर्व मनुज का, 
सिसक रहे हम छुप छुपकर।


उपलब्धि चाँद पर पहुचे हम, 
अस्तित्व उसी का भूल गये। 
विज्ञान की सीढ़ी पर चढ़कर, 
अपनी शक्ति पर फूल गये। 
 पथ अवरुद्ध हुआ मनुज का, 
सिसक रहे हम छुप छुपकर।


रचना सक्सेना 
प्रयागराज 
5/5/2020 
मौलिक


*मुक्तक*


 सोचना है देश का अब किस तरह कल्याण हो,
फूल से सरशब्ज़ सुरभित किस तरह उद्यान हो,
द्वैष,घृणा, वासना,वायरस में कैद है यह जिन्दगी,
किस तरह इन बन्धनों से मुक्त अब इंसान हो।
  
                 *कुमकुम "पंकज"*
                        जनपद गोण्डा।


हमारी विरासत:लाल क़िला
लाल किले की प्राचीरों मैं
छिपे हैं आज  कई इतिहास
विरासत की ये सुंदर यादें
स्थापत्य कला का सुनहरा आकाश
मुगल काल से आज़ादी तक
सीना ताने अटल खड़ा
शासन चाहे किसका भी हो
 लाल किले का मान बढ़ा
आज़ादी की इसके दर पर
लिखी नई कहानी है
स्वतन्त्रता संग्राम की कहता
सबसे बात पुरानी है
ख्याति इसकी विश्व पटल पर
विश्व धरोहर माना इस पर
सरकारी निगरानी है
थाती है ये हिंदुस्तान की
दिल्ली की शान पुरानी है
बाग-बगीचे और हरियाली
अष्टभुजी वास्तु है निराली
यमुना की छाया मैं देखो
 इसकी छवि निराली है
लाल किले ने हर शय लिखी
अनुपम बड़ी कहानी है।
डॉ. निर्मला शर्मा
दौसा राजस्थान
[5/6, 6:54 AM] कवि सुनील कुमार गुप्ता: कविता:-
       *"संवाद"*
" संवादहीनता से ही साथी,
बढ़ती है-
घुटन जीवन में।
बना रहे संवाद आपस में साथी,
होती नहीं समस्या -
इस जीवन में।
सार्थक संवाद से ही साथी,
मिटते सभी विवाद -
इस जीवन से।
संवाद से मौन रहना बेहतर साथी,
यदि बढ़े विवाद-
इस जीवन में।
संवाद हो गरिमा पूर्ण साथी,
मधुर होते संबंध-
मिलती सफलता जीवन में।
प्रभू कृपा हो संग में साथी,
संवाद-संवाद रहे-
बने न विवाद जीवन में।।"
ःःःःःःःःःःःःःःःः
         सुनील कुमार गुप्ता
sunilgupta.abliq.in
ःःःःःःःःःःःःःःःः
           06-05-2020
[5/6, 6:54 AM] कवि राजेन्द्र रायपुरी: 😊😊    यही हक़ीक़त    😊😊


दुख के दिन काटे नहीं कटते,
                   सुख के हवा-हवाई।
स्वाद कसैला घंटों रहता,
                   पल भर रहे मिठाई।


रात सुहानी पिया साथ जो,
                   विरह लगे दुखदाई।
लगें पहाड़ बिरह की रातें,
                   राई  सम  सुखदाई।


दोस्त बनाते वर्षों लगते, 
                   दुश्मन पल में भाई।
सहज सरल मिल जाए सरिता, 
                   गंगा  तो  कठिनाई।


झूठ कहे पतियाॅ॑य बिना हिच,
                 साॅ॑च बहुत कठिनाई।
जाॅ॑चें - परखें, खूब   दूध  को,
               मय को कबहुॅ॑ न भाई।


          ।। राजेंद्र रायपुरी।।
[5/6, 7:32 AM] कवियत्री डॉ0 निर्मला दौसा राज: "शराब और शराबी"


वैज्ञानिक युग की ये
तकनीक से भरी दुनिया है
नापा मानव ने पृथ्वी को
छोड़ी न अंतरिक्ष तक कहीं दूरियाँ हैं
फिर भी देखो आम आदमी
उसके पेट की सलवटों मै
 अब भी भोजन न मिल पाने की
अथक मजबूरियाँ हैं
आज विज्ञान और धर्म दोनों हारे हैं
लोग अब भी अपनी
 परेशानियों के मारे हैं
धर्म, अध्यात्म भी तो
समाज का अटूट हिस्सा है
आज देखिये तो दिखाई देता
सर्वत्र इनका नया किस्सा है
बन्द हैं ईश उपासना स्थल
खुल गए हैं शराब-ए-खाना हैं
चरणामृत अब नहीं कोई लेता
बन्द मन्दिर के हैं कपाट
नहीं कोई खोलता
अब तो मयखानों की दुनिया
आबाद हुई जाती है
अब सरे आम वो
सड़कों पे छलकाई जाती है
कोई देखे  समाज का ये
कैसा भयानक मंज़र है
न कोई रोक-टोक
न ही किसी का डर है
अब खुले आम
शराबी शराब पीता है
घर मै बच्चे हैं भूखे
कनस्तर भी अब तो रीता है
पर न दो रोटी का ही 
जुगाड़ कहीं मिलता है
मिल ही जाती है आसानी से
 शराब वो ही पीता है
उसको अब फिक्र नहीं है
अपने परिवार की अब
अब वह तो अपने प्याले में
दुनिया बसा के बैठा है
छलकी जाती है अब शराब
ये कैसा विप्लव है
अब शराबी हुआ आबाद
समाज बेढ़ब है
 
डॉ. निर्मला शर्मा
दौसा, राजस्थान
[5/6, 7:40 AM] कवि सत्य प्रकाश पाण्डेय: संकटों में गर्व से मुस्कुराना सीख लें
परमब्रह्म के जीवन से जीना सीख लें


कारागार में जन्म बंधन मुक्त हो गये
नवजात शिशु से पूतना प्राण सो गये


धेनु रक्षक बन करके गोपाल कहलाये
भक्तों की पुकार सुन दौड़े दौड़े आये


डटकर किया मुकाबला मुसीबतों का
शिकन नहीं चेहरे पर सहचर भक्तों का


गोविन्द से कष्टों को हराना सीख लें
संकटों में गर्व से मुस्कुराना सीख लें।


गोविन्दाय नमो नमः👏👏👏👏👏🌹🌹🌹🌹🌹


सत्यप्रकाश पाण्डेय
[5/6, 7:51 AM] एस के कपूर
बरेली
डायरेक्टर महिंद्रा कोचिंग: *कॅरोना।।पल भर में चालीस दिन की*
*तपस्या खराब मत कर देना।*


गहरा संकट देश  पर  कॅरोना
ने  पैर    पसारा    है।
महामारी से निपटने को  बस
लॉकडाउन सहारा है।।
अनुशासन  अनुपालना   दूरी
सामाजिक मंत्रआज के।
उसकी खैर नहीं समझो जिसे
कॅरोना ने   निहारा   है।।


आज कॅरोना के साथ ही  जीने
का   ढंग बन   गया    है।
ये विनाशकारी कॅरोना  सम्पूर्ण
विश्व का अंग बन गया है।।
मास्क लगाकर धो धो कर हाथ
पीछे पड़ना है कॅरोना के।
विकास  करना हरा कर कॅरोना
को अब जंग बन गया है।।


कोविड वायरस ने बड़ी  विकट
दुविधा रचाई  है।
कोई प्रलय   जैसी समस्या  पूरी
दुनिया में छाई है।।
एक भूलऔर लापरवाही पड़ेगी
मंहगी   बहुत  ही।
ये विपदा पूरी  दुनिया  को  एक
साथ   ले आई  है।।


चालीस दिन की   तपस्या   यूँ  ही
खराब मत    कर     देना।
नशे नशे मेंअपनी इस  जिंदगी को
शराब  मत   कर    देना।।
बहकते हुऐ तेरे कदम  कहीं   फंस
ना जायें कॅरोना के जाल में।
पल भर में ही चल रही जिन्दगी को
यूँ ही  निराश मत  कर देना।।


*रचयिता। ।  एस के कपूर  "श्री हंस"*,
*बरेली।*
मो।       9897071046
             8218685464
[5/6, 8:03 AM] भरत लाल नायक: *"रहो तजकर दानवता"*
(कुण्डलिया छंद)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
¶मानवता के भान से, होता मानव-बोध।
लक्षित होती दनुजता, करता है जब क्रोध।।
करता है जब क्रोध, दर्प का थामे दामन।
विकसे अधम-अधर्म, धर्म का जलता कानन।।
कह नायक करजोरि, रहो तजकर दानवता।
छोटी सी ही बात, नष्ट करती मानवता।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
 *"सोचकर बोली बोलो"*
(कुण्डलिया छंद)
****************************
■दहलाता दिल को कभी, छोटा कड़वा बोल।
कारण बनता बैर का, देता है विष घोल।।
देता है विष घोल, सोचकर बोली बोलो।
बोली बने न बाण, शहद वाणी में घोलो।।
कह नायक करजोरि, स्नेह मन को सहलाता।
करो न वह परिहास, हृदय को जो दहलाता।।
***************************
भरत नायक "बाबूजी"
लोहरसिंह, रायगढ़(छ.ग.)
****************************
[5/6, 8:32 AM] कवि देवानन्द साहा कोलकत्ता: 👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍
सुप्रभात:-


मन चंचल रहता है,दिल प्रायःस्थिर रहता है।
अतःदिल का फैसला प्रायः गम्भीर रहता है।
-------देवानंद साहा"आनंद अमरपुरी"
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
[5/6, 8:37 AM] निशा अतुल्य गुप्ता देहरादून: चलते चलते 
6.5.2020



चलते चलते जीवन का 
विराम गति को दे जाना 
जीवन की अंतिम सीढ़ी है 
जीवन की गति चलते जाना।


फूलों का खिलना उपवन में
खिल कर फिर मुरझा जाना
नही रुकता जीवन पौधों का
जीवन है बस चलते जाना।


चिड़ियों की चूंचूं सुनकर
जीवन को गति मिल जाती है 
सूरज का रोज निकलना भी 
जीवन की रीत सिखाती है ।


चलते रहना अविराम यहाँ
नए आयाम बनाती है 
रुक जाना यूँ ही जीवन का
अंतिम पहर कहलाती है ।


चलते चलते मंजिल मिलती
जीवन को सफल बनाती है 
रुक जाना किसी भी जीवन का
बस अंतिम पहर कहलाती है ।


बस अंतिम पहर कहलाती है ।


स्वरचित 
निशा"अतुल्य"
[5/6, 9:12 AM] कालिका प्रसाद सेमवाल: *🌹⚜️अपनी मां⚜️🌹*
*******************
अपनी मां जन्नत की नूर होती है
अपनी मां की प्रार्थना प्रिय होती है
अपनी मां त्याग तप की खान होती है,
अपनी मां चारों धामों सी होती है।


अपनी मां प्रेरणा की मूर्ति होती है,
अपनी मां समर्पण की सूरत होती है,
अपनी मां हिमालय से ऊंची होती है,
अपनी मां पतित पावनी गंगा  होती है।


अपनी मां परिवार की रीढ़ होती है,
अपनी मां परिवार में संस्कार दात्री होती है,
अपनी मां घर की रौनक होती है,
अपनी मां कुल का मार्गदर्शक होती है।


अपनी मां वैदिक ऋचाएं होती है,
अपनी मां गुरु ग्रंथ  की वाणी होती है,
अपनी मां परिवार के धर्म 
न्याय के संस्कार देती है,
अपनी मां परिवार की  प्रार्थना होती है।


अपनी मां बासन्ती बयार होती है,
अपनी मां ही गुनगुनी धूप सी होती है,
अपनी मां ईश्वर की प्रतिनिधि होती है
अपनी मां ही इस धरा के सारे तीरथ होती है।


हर भारतीय की पांच मां होती है,
धरती,भारत,गंगा,गाय व जन्मदात्री मां,
दूसरों की मां भी अपनी मां ही होती है,
पर सबसे दुलारी अपनी मां होती है।
********************
कालिका प्रसाद सेमवाल
मानस सदन अपर बाजार
रूद्रप्रयाग उत्तराखंड
[5/6, 10:25 AM] Yd 26 डॉ रामकुमार झा निकुंज: 🌅सुप्रभातम्🙏🏜️


सत्य सदा से माँगता , रक्षण नित बलिदान।
राम स्वयं घनश्याम हों , तज परहित  सम्मान।। 
नवप्रभात अभिलाष में , रवि सहता तम घोर।
आवाहन सत्कर्म का , कर तप लाता भोर।।
कवि✍️डॉ. निकुंज


474
नैना नैनन के प्यासे ।
 अधर अधरन के प्यासे ।


प्रीतम की इन यादों में ,
स्पंदन साँसों के साजे ।


 आ जाएं प्रीतम मोरे ,
 भा जाऊँ मैं मन में ।


 ये मन भागे ,
 मन के आंगे ।


 राह तकी है जन्मों से ,
 जन्म जाने कितने आंगे ।


नैना नैनन के प्यासे ।
 अधर अधरन के प्यासे ।


 पा जाऊँ एक छवि प्रीतम की ,
 खो जाऊँ मैं बस प्रीतम में ।


आज नयन से ,
नैना इतना मांगे ।



बंद हुये मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे गिरजा के दरवाजे ।
 करने निकले धन के उजियारे सोम सुरा के मतवाले ।
कैसे कह दे पैसार हुआ नही अभी कलयुग का ,
भूल गए है मर्यादाएं सारी पड़ते धन के लाले ।


.... विवेक दुबे"निश्चल"@....



*रोज नया दिन*
विधा: गीत


आशा और निराशा लेकर आता,
हर रोज नया एक दिन।
जहाँ जीने का हर कोई ढूढता, 
एक नया ही ठंग।।
आशा और निराशा लेकर आता,
हर रोज नया एक दिन।।


सूरज की पहली किरणों से,
जिस घर का होता सबेरा।
जिस घर में पूजा भक्ति के, 
गीत सदा ही गूंजे।
और बढ़े बूढ़ों का मिलता रहे,
सबको आशीर्वाद सदा।
उस घर में सदा सुख शांति,
बनी रहती है हमेशा।।
आशा और निराशा लेकर आता,
हर रोज नया एक दिन।


जिस गांव और शहर में गूंजे,
गुरुवाणी और आज़ान। 
और आरती के दीपो से,
घर घर मे पहुंचे प्रकाश।
उस गांव और शहर में,
बनी रहती सुख शांति सदा।
हिल मिलकर सब जातीधर्म के,
लोग रहते यहाँ।।
आशा और निराशा लेकर आता,
हर रोज नया एक दिन।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)
06/05/2020


पहले प्यार की खुशबू से तर हर दिल होता है।
 प्यार में सब कुछ दे देना भी मुश्किल होता है।।
सच्चा प्रेमी पढ़ लेता है नैनों की भाषा ,
 मौन निमंत्रण जो न समझे जाहिल होता है।
 आए लहरा कर छू ले फिर वापस हो जाए,
इंतजार में लहरों के बस साहिल होता है।
 कौन कहां कब मिल जाए यह किसको है मालूम,
 दिल में बसकर दिल तोड़े,पत्थर दिल होता है।
 प्रेम भाव से उपवन से चुनकर के जो लाएं,
 फूल वही उसकी पूजा के काबिल



लघुकथा


सिर्फ तुम


"सुना है तुम्हारी माँ तुम्हारे लिये लड़कियां देखते देखते थक गयी थी फिर मुझ जैसी काली लड़की को तुमने अपना जीवन साथी क्यों चुना? उनका कहना था कि तुम्हे कोई लड़की पसंद ही नही आती थी 'हसते हुऐ नीलम ने अंकुश से पूछा। तुम्हे मालूम है मैं जिस तरह की लड़की को अपनी पत्नी के रुप में तलाश कर रहा था वह सभी गुण तुझमें दिखे। सहनशीलता, सेवा, रिश्तों की मर्यादा का मर्म सब कुछ देखा तुझमें और हां कर दी बस, मेरे लिये यही खूबसूरती सबसे बड़ी थी ।"यहीं शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे कि तभी किसी की आवाज ने जैसे उसके कान पर  हथौड़े से वार कर दिया " यह लीजिये मृत्यु प्रमाणपत्र " ओह, हे भगवान क्या यह हकीकत है? फिर आँखों की कोरो से आँसू पोछते हुऐ वह फफक कर रो पड़ा यह कहते हुऐ कि" तुमसे बिछड़ कर जीना मुश्किल होगा हर पल अब हमारा लेकिन फिर भी खुश हूँ कि तुम इस कोरोना की जंग में लाखों लोगों की सेवा करते करतें शहीद हो गयी।


रचना सक्सेना
प्रयागराज
स्वरचित
6/5/2020



दिनांकः ०६.०५.२०२०
दिवसः बुधवार
विधाः कविता( मुक्तक)
शीर्षकः चूड़ियाँ 
माँ   बहनें    वधू  तनया , खनकती   हाथ   चूड़ी   से।
प्रिया   हँसती   लजाती  सी  सजन  मनहार  चूड़ी से।
लगा   बिंदी   सजी   मेंहदी  पहन   चूड़ी चहकती  है।
ख्वावों  की   सजा  महफ़िल  चूड़ियों  से दमकती है।


चली शीतल हवा फागुन , अवनी कलसी महकती है।
घने बादल खुले अम्बर  बिजलियाँ चूड़ी चमकती  है।
सागर की लहरें सलिल निर्मल नदियाँ पा दमकती हैं।
चातक सी प्रिये प्यासी चूड़ियाँ सज आश मचलती है। 


चूड़ियाँ गहने  सुहागन की  मनोहर चित्त साजन की।
माँ सुना लोरी हृदय टुकड़े  खनकाती हाथ की  चूड़ी। 
फुदकती  सी  इतराती  आ   मुदित  बेटी पहन चूड़ी।
कलाई  रेशमी  डोरी  भाई  बहन  आयी  पहन चूड़ी।


सजावत  मात्र न समझें  है  नारी   सम्मान  ये  चूड़ी,
साधन नित  सुहावन तनु  मनोरम  दिलदार  ये चूड़ी,
मनोभावन न है   केवल , सुहागन  प्रतीमान  है चूड़ी,
मधुर   सुन्दर  सजन मनहर प्रिया उपहार  ये   चूड़ी। 



दिनांकः ०६.०५.२०२०
दिवसः बुधवार
विधाः गीत
शीर्षकः आओ जोड़ें दिल तार सखी!
दुर्गम   दुखदायी  राह  बहुत, 
अतिजोरों    से  है हवा चली , 
घनघोर   घटा   छायी अम्बर , 
विकराल जलद सौन्दर्य घड़ी।


 है कठिन मार्ग  विस्तार बड़ा ,
 गढ्ढे    गह्वर    सूखी   झाड़ी, 
 बन पीत गात्र  इन  पत्तों   के,
 विपरीत दशा लखि मन भारी। 


 है  प्रेम   परीक्षा  आन   पड़ी,
 दिल चाह मिलन परवान चढ़ी,
 हो स्मृतिपटल  लम्हें अविचल,
 हे कमलनैन  कचनार   कली।  
 
 गलहार बने   एकान्त   सजन 
 विश्वास  हृदय  अहसास  करें,
 शनैः शनैः रस प्रिय पान सुधा,
मिल मुदित  मना अनुराग करें।


 निश्चल  कोमल   मनुहार प्रिये ,
 मुख चारुतमा  चन्द्रहार  हिये ,
 लता लवंगी  कृश  मधुमासी , 
मिल प्रेमयुगल अभिसार  प्रिये।  


नवजीवन   की   माला    गूँथें,
अन्तर्मन भाव  सलिल   सींचें,
बन हरित भरित प्रिय धीर ललित, 
हास भाष  मृदुल  उदात्त  बनें। 


विपरीत  प्रकृति  में  प्रीत मुखर ,
हर्षित  विलसित अवसाद  ज़हर ,
देंखें    महकें   मन     सूर्यमुखी, 
आओ जोड़े  दिल   तार  सखी।। 


कवि✍️डॉ..राम कुमार झा "निकुंज"
रचनाः मौलिक (स्वरचित)
नवदिल्ली


 


डॉ प्रताप मोहन "भारतीय  

*** आह ज़िन्दगी ***
जिंदगी तुम्हारे पास
रहकर भी तुमसे
कितना दूर रहा हूँ
ज़िंदगी अब तुम्हें
मैं जीना चाहता हूँ
सारी उम्र गुजारी
जिम्मेदारीयाँ निभाने में
अब तो मैं तुम्हे
जी भरकर
जीना चाहता हूँ
बचपन में पढाई और
युवा होकर रोज़गार
ढूढ़ने में जिंदगी गवाई
शादी के बाद नयी
जिम्मेदारियों ने घेरा
बढ़ा परिवार तो
बच्चो की ज़िम्मेदारी आई
बच्चो को बडा बनाने
के चक्कर में
अपनी ज़िंदगी गवांई
बच्चों ने बड़ा बनकर
अपनी अलग दुनिया बसाई
वापस ज़िन्दगी मुझे
उस मोड़ पर लाई
अगर जीना है तो
आज जियो अभी जियो
क्योंकि शायद कल
कभी आता नहीं हैं
  लेखक -
          डॉ प्रताप मोहन "भारतीय          308, चिनार - ऐ - 2 ओमैक्स पार्क वुड - बद्दी - 173205      (H P)
  मोबाइल - 9736701313
Email - DRPRATAPMOHAN@GMAIL.COM


मधु शंखधर स्वतंत्र प्रयागराज

*लोकगीत....*


सूरतिया निहार पिया बलि -बलि जाऊँ।
 मैं बलि बलि जाऊँ.....।
चंदा कहूँ या तोहे सूरज बोलाऊँ।
मैं बलि - बलि जाऊँ।।


श्याम सलोने सी सूरतिया पाई।
मोहक से नैना मा दुनिया बसाई।
एही नैनन मा बहुत सुख पाऊँ।
मैं बलि- बलि जाऊँ।
सूरतिया निहार............।।


अधरन कै लाली पिया बहु सोहै।
घुँघराले काले केश मन मोहै।
अँगुरी से उलझी लटे सुलझाऊँ।
मैं बलि- बलि जाऊँ।
सूरतिया निहार.................।।


 तोहरी सूरत का मन मा बसाउब।
सबकी नजरिया से तोहका बचाउब।
कजला लगाइ नजर से बचाऊँ।
मैं बलि- बलि जाऊँ।
सूरतिया निहार.................।।


कान्हा मैं मुरली की धुन सुन आई।
राधा सी तोहके हिया में बसाई।
तोहरी पीरितिया में सुध बिसराऊँ।
मैं बलि बलि जाऊँ।
सूरतिया निहार................।।
*मधु शंखधर स्वतंत्र*
*प्रयागराज*


काव्य रँगोली आज के सम्मानीति रचनाकार अर्चना द्विवेदी अयोध्या उत्तर प्रदेश

काव्य रंगोली आज के सम्मानित सफल रचनाकार
अर्चना द्विवेदी अयोध्या उत्तर प्रदेश
पति  :श्री कामेश्वर प्रसाद दूबे
मलिकपुर,पोस्ट डाभासेमर अयोध्या, उ0प्र 224133
 मो नं .8004063262
- जन्म तिथि 19 जुलाई
- शिक्षा: परास्नातक (अंग्रेज़ी)
- व्यवसाय:अध्यापन
******************


एक बेटी का दर्द


1-हर रूठी नजरों का  सामना,
मैं कैसे करूं?कुछ तो बोलो।
क्या बेटी होना है गुनाह??
विष बंध रूढ़ियों को खोलो।


महकी जब  उपवन  में  तेरे,
खुशियाँ  न  मंगलगान  कहीं 
चेहरे पर  खींची दुःख  रेखा,
होठों पर  थी  मुस्कान  नहीं।
मन निश्छल है, तन  कोमल  है,
मेरे हृदय  संग तुम भी हो लो।


कुलदीप नहीं तेरे आँगन की,
यह बात अखरती  है तुमको।
दो कुल में उजाला है  मुझसे,
एहसास नहीं है क्या तुमको।
यह लिंगभेद की मलिन सोच 
पावन   गंगा  में  अब  धोलो।


जब सूरज भेद नहीं करता,
अपनी  किरणें  फैलाने  में।
ईश्वर दो  सोच  नहीं रखता ,
अपनी  कृपा  बरसाने  में।
फ़िर मानव की औकात है क्या?
इस नियम पे कुछ खुद को तोलो।
             (अर्चना द्विवेदी)
अयोध्या उत्तरप्रदेश



2
सच्चा सुख



सच्चे सुख की अनुभूति मिले
मेहनत  की  रोटी  खाने   में।
बहुमुल्य सा ये अपना जीवन
क्यों  व्यर्थ  करें  अलसाने में।


प्यासे  की  प्यास बुझाने  को,
कभी कूप नहीं चलकर आते।
एक बूँद का मूल्य समझ आता,
जब हम खुद ही चलकर जाते।।


होती है अति लघु काया पर,
चींटी  मेहनत  से न  डरती ।
कब रोक सकी पथ बाधाएं,
संकल्प सदा दृढ़ ही रखती।।


न चमके  क़िस्मत  जादू से,
न होते करिश्में पल  भर में ।
जिस उर में लौ हो मेहनत की,
वही जीवन  में आगे  बढ़ते ।।


जो वक़्त के सम्मुख झुक जाए,
मेहनत का फल कहाँ वो पाता।
न चख  पाता मृदु  स्वाद कभी,
जो अथक  परिश्रम  से आता।।
       अर्चना द्विवेदी
            अयोध्या उत्तरप्रदेश
3-
प्रकृति का भेद
चाँद  बिखेरे  धवल  चाँदनी
करने  को  श्रृंगार  निशा का।
दिनकर चलता रहे अनवरत
करने को पहचान दिशा  का।।


नदियाँ करती हैं ध्वनि कल कल
सागर  बीच  समा  जाने  को।
उपवन अलि की बाट जोहता
कोंपल नई  खिला  पाने  को।।


पतझड़  स्वयं  बियाबां  होता
ऋतु मधुमास सुघर करने को।
मौत  अनोखे  रौब  दिखाती
जीवन सत्य पे मर मिटने को।।


खो के अपना अस्तित्व गगन में
तारक  हिय में  खुशियाँ  पाते।
टूट  बिखरना  हित  औरों  के
खुद ही मिटकर सदा सिखाते ।।


हृदय जीत  लेती मृदु  बोली
परम शत्रु  बनते   हितकारी।
प्रेम भाव हो मन से मन का
अवनी स्वर्ग सी हो सुखकारी।।


साँसों का संगीत मधुर सुन
चंचल  काया  यूँ   लहराती ।
इक दूजे पर सब हैं आश्रित
प्रकृति हमें यह भेद बताती।।
       अर्चना द्विवेदी
अयोध्या उत्तरप्रदेश


4-
तुम पर गीत लिखूँ


सोचती हूँ आज तुम पर गीत मैं  लिखूँ,
तुम हो हृदय के सच्चे मनमीत मैं लिखूँ।
रस छंद अलंकारों से श्रृंगार खूब  करूँ ,
धुन नई नवल ताल सच्ची प्रीत मैं लिखूँ।।


चंदा सा  शीतल  तेरा  व्यवहार  मैं  लिखूँ ,
सूरज सा प्रखर जिन्दगी का सार मैं  लिखूँ।
पर्वत सा  अटल धैर्य उर  लहरों सी  उमंगे ,
सारे उदधि से गहरा तेरा प्यार  मैं  लिखूँ।।


संजीवनी से दृग का  प्रतिमान  मैं  लिखूँ,
दीपक की रोशनी सा तुम्हें जान मैं लिखूँ।
वाणी से  बरसती  हुई  रसधार  सुधा की ,
मरु की तपिश में बूँद का वरदान  मैं लिखूँ।।


गर्मी की दुपहरी की सुखद छाँव मैं लिखूँ,
खुशियों में थिरकते हुए दो पाँव मैं लिखूँ।
तुम हो कदम्ब  डार मैं  लिपटी  हुई लता ,
सब जीतकर भी हारने  का दाँव मैं लिखूँ।।


तीरथ से  पावन  उर  का उद्गार मैं  लिखूँ ,
वृषभानु की लली का तुम्हें प्यार मैं लिखूँ ।
उपमान फीके  पड़ गये  पाऊँ  नया  कहाँ ,
जीवन के हो अनमोल  से उपहार मैं लिखूँ।।
                                                   अर्चना द्विवेदी
                                      अयोध्या उत्तरप्रदेश


5
सच्ची सुंदरता


नहीं काम  की  वो  सुंदरता
रंग लगा हो  उथलेपन का ।
व्यर्थ है वो सारी आकुलता
जिसमें मर्म न अपनेपन का। 


अर्थ न कोई प्रेम भाव का
कवच चढ़ी हो नफ़रत की।
नहीं मिलेगी उसको मंज़िल
चाह जिसे हो ग़फ़लत की।।


क्या करना इस सुंदर तन का
लुभा सके जो केवल ही तन।
मन से मन का तालमेल  हो
तभी सफल होगा ये जीवन।।


कल न रहेगा  तन  ये सुंदर
पर सुंदर  मन साथ   रहेगा।
एकाकीपन  का  बन साथी
अंतिम क्षण तक साथ चलेगा।।
     अर्चना द्विवेदी
अयोध्या उत्तरप्रदेश


काव्य रँगोली आज के सम्मानीति सफल रचनाकार 2

रचना सक्सेना प्रयागराज


नाम --रचना सक्सेना
माता--स्व.सरोज सक्सेना
पिता--श्री सूरज प्रसाद   
         सक्सेना
पति--संजय सक्सेना
पता--101/174-A 
         Alopibagh
         Allahaba
         (U.P)Pincode-
          211006


2..जन्मतिथि--- 27/5/1969
3..शिक्षा-- एम.ए,बी.एड,संगीत प्रभाकर (सितार) 
4..कार्यक्षेत्र/व्यवसाय--- गृहणी
5..रुचि---सिलाई कढ़ाई, पेंटिंग, एवं गद्य पद्य लेखन
6..निवास स्थान---प्रयागराज, उ0प्र0
7..मोबाइल नं---7376290559 
8..ई-मेल---rachnasaxena13@gmail.com
9..ब्लॉग---जीवन एक पहेली
10..फ़ेसबुक पेज (फेसबुक पेज)कवि और कविता
https://www.facebook.com/rachnasanjaisaxena/
(फेसबुक पेज) कथा कहानी 
https://www.facebook.com/%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-1198711686848686/
11..लेखन विधा---गद्य - लघुकथा और कहानी
पद्य - छंद मुक्त रचनाएं, गीत और गजल 
12..प्रकाशित कृतियाँ--- एकल और साझा 
एकल - सृजन समीक्षा, द्वंद, किसकी रचना
साझा संकलन- (पद्य) भारत के प्रतिभाशाली हिन्दी रचनाकार, 
भारत की प्रतिभाशाली हिन्दी कवयित्रियां, काव्य अमृत, 
(गद्य) नई सदी की लघुकथाएँ, मित्रता: एक सम्बल, घर को सजाती सवारती लघुकथाएँ
एवं अनेक पत्र पत्रिकाओं मे कविताओं एवं लघुकथाओं का प्रकाशन - रुपायन, काव्य रंगोली, प्रेरणा, अनन्तिम, प्रेरणा-अंशु, पंखुड़ी, हिन्दी सागर, गुफ्तगू, हिन्दोस्तान समाचारपत्र, रुहेलखण्ड प्रकाश हिन्दी साप्ताहिक, प्रतिक्षण टाइम्स बहराइच, कायस्थ रश्मि बरेली,लोकजंग समाचार पत्र ज्ञान सवेरा शाहजहांपुर का, और मेरठ का विजय टाईम्स दर्पण 


13..प्राप्त सम्मान--1- जे0एम0डी0 पब्लिकेशन्स द्वारा नारी गौरव सम्मान, प्रतिभाशाली रचनाकार सम्मान, और काव्य अमृत सम्मान 
2- काव्य रंगोली पत्रिका लखीमपुर द्वारा काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान 2017, साहित्य गौरव सम्मान 2018 एवं नारी रत्न सम्मान 
3- साहित्य एवं सांस्कृतिक मंच (हिन्दी साहित्य शोध अकादमी,राजस्थान) द्वारा फेसबुक साहित्य पहेली क्रमाँक
-अंतराशब्द शक्ति द्वारा women आवाज सम्मान 
काव्य मंजरी समूह द्वारा नारी भूषण सम्मान
4- गुफ्तगू साहित्यिक संस्था प्रयागराज द्वारा बेकल उत्साही सम्मान 2019 
5- राष्ट्रीय रामायण मेला प्रयाग द्वारा काव्य-प्रवीण सम्मान से सम्मानित 
-शहर समता मंच इलाहाबाद द्वारा शहर समता समाचार पत्र कें कवि और कविता विशेषांक रचना सक्सेना पर आधारित अंक का लोकार्पण
14- आकाशवाणी पर काव्यांजली के अन्तर्गत काव्यपाठ
15- शहर के अनेक साहित्यिक मंचों और संस्थाओं से संबद्ध
16-जिले स्तर पर अनेक कवि सम्मेलनों में सक्रीयता
17- महिला काव्य मंच प्रयागराज ईकाई की अध्यक्ष एवं शहर समता विचार मंच की साहित्यिक संयोजक


प्रकाशित पुस्तकें


एकल पुस्तकें


1- किसकी रचना
(गुफ्तगू प्रकाशन)
2-द्वन्द
3- सृजन समीक्षा


साझा संकलन


1- भारत के प्रतिभाशाली हिन्दी रचनाकार, 
2-भारत की प्रतिभाशाली हिन्दी कवयित्रियां,
3- काव्य अमृत,
4- नई सदी की लघुकथाएँ, 
5- मित्रता: एक सम्बल, 
6- घर को सजाती सवारती लघुकथाएँ
7-बज्म-ए-हिन्द


मेरी 5 कविताये


*लो चल पड़ी कलम*


दर्द गहराया आँखों में-
लो चल पड़ी कलम।


कभी माँ कभी बेटी, 
कभी पत्नी कभी बहन, 
दिखी सिसकियाँ लेती - 
अंदर उठी दहन। 


लो चल पड़ी कलम।


कभी अपने कभी पराऐ, 
कभी रिश्ते कभी नाते, 
यादें हिचकियाँ लेती - 
ऐसी लगी लगन। 


लो चल पड़ी कलम।


कभी घर कभी बाहर, 
कभी गाँव कभी शहर, 
डगमगाती किश्तिया़ देखी - 
फिर से उठी अगन। 


लो चल पड़ी कलम।


कभी आँधी कभी तूफान, 
कभी सूखा कभी गीला, 
उजड़ी बस्तियाँ देखी - 
सह न सकी जलन


लो चल पड़ी कलम।


रचना सक्सेना 
प्रयागराज 



अखबार


तुम्हारे अस्तित्व के, 
झरोखों से-
झाकतीं हूई, 
हर सुबह, 
कल की सच्ची तस्वीर को-
आज भी ढ़ूढ़ती है, 
तुम्हारें हर पन्नों पर, 
लेकिन छोटे बड़े अक्षरों से-
सवरा तुम्हारा आईना, 
अब झूठ लगता है, 
क्योकि - 
ऐसा लगता है कि, 
अब तुम भी बदल गये हो - 
लग गया है एक मुखौटा-
जमाने की गर्म हवाओं का-
इसीलिये तुम हम हो गये, 
और हम तुम में बदल गये। 
पड़ोसी की छोटी सी खबर 
एक वाट्सऐप से एक मिनट में 
फैल जाती है सारे जमाने में - 
और तुम सच्ची खबरों पर भी, 
पर्दा डाल कर - 
महत्वपूर्ण बिम्बों कों, 
आम बना देते हो, 
शायद, 
बिक गये हो - 
और मैं आधुनिकता की दौड़ में - 
दौड़ती हुई, 
एक अखबार बन गयी। 


रचना सक्सेना 
मौलिक 
प्रयागराज



संवेदनाएँ मुहारे से-  बुहर-सी गयी हैं, 
एहसासों की अर्थी अब उठ चली है।
चिता जल रही है धुँआ उठ रहा है, 
पता नहीं काफिला किधर चल पड़ा है? 
मौन हैं हम- आँसू बहाते नहीं है, 
किसी घाव पर मल्हम लगाते नहीं है।
मतलब, बस अपने से- मतलब रखना, 
स्वार्थ को अपने ही आँचल में बंँधना।
इस आँचल में सारी खुशियाँ हमारी, 
छोड़ दी है, रीति- "वह सारी पुरानी।" 


-रचना सक्सेना
प्रयागराज 
मौलिक


सूरज बनना कठिन बहुत है


पहले आग मे जलना होगा
जल जलकर फिर तपना होगा
तपकर भी नही मरना होगा
जिंदा, जल कर रहना होगा


           सूरज बनना कठिन बहुत है


दिन भर सूरज घूम रहा है
जल जल खुद से जूझ रहा है
क्या उसको यह सूझ रहा है
गजब, पहेली बूझ रहा है


            सूरज बनना कठिन बहुत है    


लपटों मे लिपटा वह हरदम
जल जल ताप को सहता हरदम
निराजल उसका ब्रत हरदम
फिर भी, चुप रहता वह हरदम


          सूरज बनना कठिन बहुत है


मोह माया छोड़ी इस तन की
अहंकार भी छोड़ी मन की
चिंता सारे वायुमंडल की
कामना करता सबके मंगल की


           सूरज बनना कठिन बहुत है


रचना सक्सेना
प्रयागराज


मूल तत्व है गुरू


संपूर्ण ब्रमांड ,
स्वयं मे एक ज्ञान है।
और हम मात्र एक जीव नही-
इस ब्रमांड का ही एक अंग है ।
लेकिन हम नही खोजते ,
इसमे ...
क्या ,क्यो ,और कैसे ,
से उत्पन्न प्रश्नो को -
एक अविरल गति से ,
बहते चले जाते है।
पानी के बहाव की तरह,
और सागर तट पर पहुचते ही-
श्वांसो की डोर छोड़कर,
समर्पित कर देते है ।
बस यही तक ,
सीमित है हमारा जीवन।
हम जीव है ,
और चाहते भी है ,
ब्रमांड मे सम्माहित होना ।
मोक्ष को व्याकुल हैं आत्मा,
लेकिन जीवन की गति -
समेटे है खुद को ,
चाहते हो तो ढ़ूढ़ो -
अपने हर प्रश्न का जवाब,
इस हवा, पानी ,जमीन ,आसमान,
आँधी, तूफान, पर्वत ,नदी,
पेड़ ,फूल, फल ,काँटे,
जीव -जन्तु ,पशु -पक्षी
और इन सब ऋतुओ से ।
तुम्हारे हर प्रश्न का जवाब,
इसी मे निहित है।
मिल जाऐगा इनसे ही ,
अनंत ज्ञान और ज्ञान का सार,
जो तोड़ देगा -
तुम्हारे भीतर के संशय को,
तुम्हारी अज्ञानता की जंजीरो को।
और उस लक्ष्य व उदेश्य का-
स्पष्टीकरण करके ,
स्वयं ब्रह्म मे विलीन कर देगा ।
लेकिन इस प्रकाश का ,
मूल तत्व है गुरू -
बिना उसके प्रकृति का ,
हर तत्व एक चिंता है ,
चिंतन नही ।


रचना सक्सेना 
प्रयागराज


अवधी विकास संस्थान उ. प्र. के तत्वावधान में ऑन लाइन कवि सम्मेलन का आयोजन

सीतापुर उत्तर प्रदेश


आज कोरोना महामारी का सामना सभी व्यक्ति अपने अपने तरीके से कर रहे है। इसी क्रम में अवधी विकास संस्थान एवं काव्य कला निखार मंच सीतापुर के संयुक्त तत्वावधान  में *सीता जयंती* पर अवधी ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन दो सत्रों में
2 मई और 4 मई को किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत कवि जगजीवन मिश्रा जी ने वाणी वन्दना से की। उन्होंने सुनाया-"मइया ललना समुझि दुलरावा करौ, हम बुलाई न बुलाई मुलु आवा करौ।"
रायबरेली की कवयित्री नेहा सोनी ने सुनाया -"कतो मिलति नाइ गांव की निशानी बताव गांव कैसे चली।"
बाराबंकी के प्रसिद्ध कवि रामकिशोर तिवारी ने गंगा को समर्पित छंद सुनाया-"पंथ चली सबका हर्षावति प्रेम पीयूष पियावति गंगा, सत्य सनातन त्याग दया करुणा ममता समुझावति गंगा।" अजय प्रधान ने दोहा सुनाया -"गाइ भैस पालव लगे, अब उनका बेकार।"
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लखीमपुर खीरी के कवि फ़ारुख सरल ने सुनाया -"होइ गई मकई की फसल जवान कि घर अजा निर्मोइया। बीच खेतवा मा परिगे मचान कि घर आजा निर्मोइया।" विकास बौखल ने सुनाया -"पूस माह के जाड़े मा हमहूँ प्रयाग नहाइ गएन" समीर शुक्ला जी ने सुनाया-" भोरहे मा बोले चिरइया, कोऊ कोऊ का नइया।"
कार्यक्रम का संचालन कर रहे रायबरेली के कवि नीरज पाण्डेय ने सुनाया-"यहिमा सबकै हवै भलाई,राखा जाए साफ सफाई, बिना वजह न बाहर घूमौ सामाजिक दूरी अपनाई। इनके अतिरिक्त कार्यक्रम में मधुप श्रीवास्तव नरकंकाल, समीर शुक्ला, ताराचंद तन्हा,राजमूर्ति सिंह सौरभ, मनीष मगन,दुष्यंत शुक्ला सिंहनादी,डॉ अमित अवस्थी,डॉ हरि फैजाबादी, आलोक सीतापुरी,श्रीमती विनीता मिश्रा एवं बिंदुप्रभा जी ने काव्यपाठ किया।
कार्यक्रम का आयोजन एवं संयोजन काव्य कला निखार मंच के संस्थापक एवं अवधी विकास संस्थान सीतापुर के उप जिलाध्यक्ष *अवनीश त्रिवेदी'अभय'* ने किया।
दोनो सत्रों के अंत मे *अवधी विकास संस्थान* सीतापुर के *जिलाध्यक्ष, श्रीकांत त्रिवेदी* जो ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए दोनों संस्थाओं की ओर से सभी कवियों को *अवधी रत्न सम्मान* से सम्मानित किया।


संजय जैन मुंबई

मेरी 5 कविताये
आंखों आंखों में*
विधा: कविता


तेरी आँखों में हमें, 
जाने क्या नज़र आया।
तेरी यादों का दिल पर,
शुरुर है छाया।
अब हम ने चाँद को,
देखना छोड़ दिया।
और तेरी तस्वीर को,
दिल में छुपा लिया।।


दिल की धड़कनो को,
पढ़कर तो देखो।
दिल की आवाज को,
दिलसे सुनकर देखो।
यकीन नहीं है तो,
आंखों में आंखे डालकर देखो।
तुम्हें समाने दिख जाएंगे,
और दिल में तेरे बस जाएंगे।।


जो बातें लवो पर न आये,
उन्हें दिल से कह दिया करो।
मुझे चेहरा पढ़ना आता है,
एक बार समाने दिखा दो।
जब में तन्हा होता हूँ तो,
तुम्हें दिलसे आवाज़ देकर।
अपने दिल में बुला लेता हूँ।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)



*फर्याद..*
विधा : कविता


करे फर्याद हम किस से, 
सभी तो एक जैसे है।
जब रक्षक बन जाये भक्षक,
 तो फिर किस से करे फर्याद।
कितना कुछ बदल दिया,
हुए जबसे हम होशियार।
की पहले तरह वो आत्मीयता, 
नही बची अब घरों में।।


सब के सब लूटने को,
 बैठे है तैयार यहां पर।
नियत ऐसी हो रही,
हमारे समाज की लोगों।
फिर किस से आत्मीयता की,
रखे उम्मीदे अब हम सब।
ऐसे माहौल में क्या गाँव,  
और शहर बच पायेगा।।


कलयुग में सतयुग की उम्मीदे,
हमें रखना बेकार सी लगती है।
जहाँ बेटा बेटी भी साथ,  
छोड़ देते है माँबाप का।
कितना कुछ बदल गया है,
इस कलयुगी समाज का।
अब तुम ही बताओ कि,
करे किस से फर्याद हम।
की बदल जाये हमारी सोच।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुंबई )



*निगाहें*
विधा: कविता


निगाहें बहुत कातिल है,
किसी को क्या मरोगी।
और इसका इल्जाम तुम,
न जाने किस पर डालोगी।
जबकि कातिल तुम खुद हो,
क्या तुम अपने को पहचानोगे।
और अपनी कातिल निगाहों से,
और कितनो को मरोगी।।


तेरा यौवन कितना अच्छा है,
जो सब को लुभाता है।
देख तेरे होठो की लाली,
दिलमें कमल सा खिलता है।
चलती हो लहराकर जब तुम,
दिल फूलों से खिलते है।
देखने तेरा हुस्न को यहां,
लोग इंतजार करते है।।


टूट जाएगी लोगो की आस,
जब तू किसीकी हो जाओगी।
और छोड़कर अपना घर,
उसके शहर चली जाओगी।
और चाँद सा सुंदर चेहरा,
उसके आंगन में चमकाओगी।
चाँद देखकर वो भी,
तुम से शर्मा जाएगा।
और तेरा दीवाना वो
हमेशा के लिए हो जाएगा।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)



*पहचान बनो*
विधा : कविता


स्वंय के काम करके,
बनो स्वाभी लम्बी तुम।
तभी जिंदगी महकेगी,
स्वंय के किये कार्यो से।
जो तुमने किये है कार्य,
वो सारी दुनियां देखेगी।
उन्ही कामो से तुम्हें,
मरणउपरांत याद किये जाओगे।।


ये ऐसा युग है लोगो,
जहाँ कोई किसीका नही।
सभी अपने स्वार्थी में,
सदा लिप्त रहते है।
तभी तो भाई बहिन भी,
माँ बाप से लड़ते है।
और सभी मर्यादाओ को, 
ताक पर वो रखते है।।


बस पैसा ही उनका,
माई बाप होता है।
जिसकी खातिर वो लोग,
छोड़ देते अपने माईबाप।
परन्तु भूल जाते है,
आने वाले भविष्य को।
तुम्हारे साथ भी लोगो,
यही दौहराया जाएगा।।


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)


 



जैन धर्म की शान है*
विधा : गीत भजन


जैन धर्म की शान है,  
विद्यासागर जी।
महावीर के अवतार है, 
विद्यासागर जी।
भक्तो की भक्ति भी,
कोई काम नहीं।
हम सब तुम पर,
कुर्वान है विद्यासागर जी।
जैन धर्म की शान है,  
विद्यासागर जी।
धरती पर भगवान है,  
विद्यासागर जी।।


आपकी वाणी की,
बड़ी कल्याणकारी है गुरुवर।
आपका हर शब्द ही,  
जिनवाणी है गुरुवर।
आप हो तप बाण, 
ज्ञानी, आप योगेश्वर।
आपने कृपा दिखाई,
सदा अपने भक्तो पर।
गुरुवर गुरुवर गुरुवर,  
-------- गुरुवर गुरुवर।
हो गुरुवर मेरे हो गुरवर हो  
मेरे गुरुवर ...........।
दया धर्म की खान है,  
विद्यासागर जी।
धरती पर भगवान है, 
विद्यासागर जी।।
जैन धर्म की शान है,  
विद्यासागर जी।


एक मधुर सी मुस्कान,  
चहेरे पर सजी रहती।
आपके मुख से तो,
गंगा ज्ञान की बहती।
आप तो हर तीर्थ से भी,  
पावन हो गुरवर।
आपके चरणों में,
कोटि कोटि है नमन।
महासंत तपोवन है,  
विद्यासागर जी।
धरती पर भगवान है,  
विद्यासागर जी।।
जैन धर्म की शान है,  
विद्यासागर जी।।


उपरोक्त भजन आचार्य श्री के चरणों समर्पण


जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुंबई )  
04/05/2020


संदीप कुमार बिश्नोई दुतारांवाली अबोहर पंजाब

कविता


नजर के तीर से घायल उठा कोई नहीं करता ,
मिला हो प्रेम में धोखा कहा कोई नहीं करता। 
सताते वो रहे हमको सदा कातिल अदाओं से ,
गये वो लूट के हमको पता कोई नहीं करता। 
अगर आशिक बने होते तो दुनिया रांझा कह देती , 
करें क्या प्रेम से हम पर दया कोई नहीं करता। 
पता क्या प्रेम होता है उसे ये भी बताना है ,
कभी भी पुष्प बिन पानी खिला कोई नहीं करता। 
गले तुमको लगाया है खुदा का शुक्रिया कर दो ,
हमारा प्रेम यूं हासिल किया कोई नहीं करता। 


संदीप कुमार बिश्नोई
दुतारांवाली अबोहर पंजाब


ममता कानुनगो इंदौर

*सीता*
                      वो,
                     नहीं,
                   जानती,
                  उल्लंघन,
                 मर्यादाओं का,
                धर्म पलायन,
                जनक सुता सीता।
++++++++++++++++++++
                       वो,
                      राम,
                     संगिनी,
                     सतरुपा,
                    कुलतारिणी,
                   दशरश वधू,
                   मंमलमयी सीता।
+++++++++++++++++++--
                   ना,
                   जाने,
                 कौन सी,
                 अशुभ थी,
                 बेला जिसमें,
                 दुष्ट रावण ने,
                किया सीताहरण।
+++-++++++++++++++++
                     वो,
                     पृथा,
                    जन्मी थी,
                    संहारने,
                   लंकाधीश को,
                  राम विजय हो,
                 पतिव्रता भूमिजा।
++++++++++++++++-+++
                   मां,
                  सीता,
                  ममत्व,
                  लव-कुश,
                 पर लुटाती,
                 धर्म-कर्म सीखा,
                ममतामई मां सीता।
++++++++++++++++++++
ममता कानुनगो इंदौर


निधि मद्धेशिया कानपुर

*लघुकथा*


*मानसिकता*


हेलो ..हेलो
क्षिति
कैसी हो  ?
ठीक 
और कैसा चल रहा लॉक डाउन ?
वापस वैसा ही जैसा नई शादी में चलता था..
मतलब
फिर से....
कुछ हुआ है क्या  ?
हाँ , वापसी हुई यहाँ तो पुरानी सभी बातें फिर से दोहराई जा रहीं, और पतिदेव की चुप्पी मुझे अब बहुत बुरी लगने लगी है, किशोरावस्था का बेटा और सास की वही पुरानी कहानी...
इतने सालों में सब बदल गया बस एक तेरी सास का छिछोरापन नहीं बदला।
जब बेटे बहु के बीच ही सोना रहता है उन्हें
क्यों ऐसी माएँ बेटे का विवाह करती हैं
तेरे ससुर क्या कहते है  ?
कुछ नहीं वो दूसरे कमरे में पोते के साथ सोते हैं....


निधि मद्धेशिया
कानपुर


निधि मद्धेशिया कानपुर

शुभ संध्या 
साहित्यिक
सहयात्रियो


🌞🌹 स्वप्न 🌞🌹


आयी कर सोलह श्रंगार
नवयौवन उन पर वार
उत्सुक नवजीवन को तैयार
खुला कंकन न जूड़ा गिरी गाज
स्वागत हुआ ऐसा........
तिखंडा मकान, 
दीवारें न है आसमान 
बिठाया गया उस हाल
दिया गया  गुड़-भात
अगहन की रात... 
दी गयी फटी चटाई
जिसपर नींद न आई...
ओढ़ने को था पास
मायके से ओढ़ आयी 
जो शाल...
दिया जो माँ ने पलंग
परिवार सोया रानी ननद
दहेज आया भरपूर 
भूरि-भूरि हुई प्रसंसा
चहु ओर...
सोचा नन्दोईयो ने
सगुन मिलेंगे ढेर
सास ने उतावलेपन
पर दिया पानी फेर....
लड़ीं समधिने 
हुई पटकिम-पटका 
दे न रही, मिला है इतना...
पी गए हो समझ जो 
सम्मान को पानी 
वो होते है लतखोर जानी... 
पग-फेरे हुए सात दिन बाद
वर-वधू का न क्षण भर का साथ...
प्रश्न है ईश्वर से आज...
बनाता है ऐसे सपूतों को क्यों 
किसी कवारी का सोलह श्रृंगार..
समझी जाती है उस दर पर
नारी सिर्फ बिन मोल की मजदूर ......


निधि मद्धेशिया
कानपुर


जयश्री श्रीवास्तव जया मोहन प्रयागराज

विश्व हास्य दिवस पर एक हास्य गीत
हमका माफ कर दो
ओ लल्लू की महतारी
सारे घर का काम करते
झाड़ू पोछा कपड़े धोते
दफ्तर में साहब कहलाते
घर आकर नोकर हो जाते
कैसी बिगड़ गयी किस्मत
हमारी
हमका।।।


कभी प्रेम के बोल सुने न
कभी प्यार न पाया
जब भी बैठा पास तुम्हारे
हाथ और पैर दबाया
सेवा करता रहा मैं
हरदम तुम्हरी
हमका।।।।।
मैं तो दुबला पतला मरियल
तुम हो भैस की नानी
कांधे पर जब धौल जमाओ
रोये मेरी जवानी
दूर से ही बात करो तुम
ये विनती सुनो हमारी
हमका।।।।।।।
हम जो जानते लग जायेगा
गुलामी का ठप्पा
कबहूं ब्याह न करते हम
चाहे माई कहती या बप्पा
जीवन भर रह जाते कुँवारे
जैसे थे अन्ना अटल बिहारी
हमका माफ कर दो 
ओ लल्लू की महतारी
घर पर रह कर मनचाहा खाते रहिये
हमेशा हँसते मुस्कुराते रहिये
 हास्य दिवस की शुभकामनाएं
स्वरचित 
जयश्री श्रीवास्तव
जया मोहन
प्रयागराज
03,05,2020


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

"शिव स्वरूप अति सरल विशाला"


कल्याण हेतु सदा समर्पित,
सारा विश्व अत्यंत आकर्षित,
विश्व मोहक,
जन रंजक,
परम शान्त,
वेद वेदान्त,
अजर अमर,
सहज सहचर,
पर स्नेही,
त्रिलोक गेही,
अनन्त,
मायातीत सन्त,
सत्य ध्वजधारी,
निर्विकारी,
सम्पूर्ण
परिपूर्ण,
अद्वैत,
उमा संग द्वैताद्वैत,
अति प्रिय,
सरल महनीय,
शिवगीता,
विराट पुनीता,
नियमानन्दी
भजनानन्दी,
प्रेम रूप,
भक्ति स्वरूप,
सहज ज्ञानवान,
अनन्त विद्वान,
वज्र विशाल,
महा काल,
महा कालेश्वर,
उमामाहेश्वर,
अत्यंत भोला,
समाधिस्थ अकेला,
परम स्वतंत्र,
आध्यात्मिक लोकतंत्र,
भगवान शिव सतत प्रणम्य हैं,
सर्व सुलभ सुगम्य हैं,
बार-बार नमन,
अभिनन्दन व वन्दन।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

"पूजनीय माँ सरस्वती जी"


            (चौपाई)


करुणाकरण पुण्य  शिव सलिला।
सरस सुकंठ सौम्य कोकिला।।


नम्य अदम्य सुघर शुभ  विद्या।
खुश हो देती वर नित आद्या।।


अति शुभमय विश्वास बनी हो।
भक्तजनों की आस बनी हो।।


त्रिपुर मोहिनी बनी लेखिका।
परम स्वतंत्र महान साधिका।।


साधन साध्य बनी इक तुम हो।
तीर नर्मदा नम अति प्रिय हो।।


बैठ हंस पर सोहर गाती।
घर-घर में उत्साह मनाती।।


छवि झाँकी अति प्रिया आरती।
पावन संस्कृति दिव्य भारती।।


सहज कुशल पोषक दिन-राती।
अग्र पंक्ति सम्मत वाराती।।


तिल अरु ताड़ तुम्हीं हो माता।
व्यापक अतिशय सूक्ष्म विधाता।।


कर्म प्रधान तुम्हीं हो जगमय।
धर्म विधान निधान सत्यमय।।


वीणा की मधु ध्वनि बन आओ।
सुप्त चेतना सतत जगाओ।।


रोग-भोग को नष्ट करो माँ।
दुःख-पीड़ित का कष्ट हरो माँ।।


चैन-नींद में हो हर प्राणी।
दो सुशांति माँ वीणापाणी।।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

"जीवन में उत्साह जरूरी"


उत्साह का अभाव एक ऐसा बदनसीब बाप है जो निष्क्रियता जैसी  अनाथ बेटी को जन्म देता है,
ऐसी अभिशप्त बेटी सम्पूर्ण समाज में उपेक्षित और उपहासित हो जाती है,
प्रताड़ित होकर
नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाती है,
संसार में उसके लिए कोई स्थान नहीं, कोई पहचान औऱ सम्मान नहीं,
रौरव नरकगामिनी निष्क्रियता
अपने पापों का प्रायश्चित करती है,
अनेकानेक ठोकरें खाती है,
गिरती उठती और पुनः गिरती है,
रोती और चिल्लाती है,
कभी अभागे बाप को तो कभी खुद को कोसती है,
सामने अंधकार है,
जीवन बेकार है,
सबकुछ नकार है,
जिन्दगी को धिक्कार है।
मन अशान्त है,
वर्तमान और भविष्य भयाक्रांत हैं,
दिल में हलचल है,
बुद्धि विह्वल है,
सारे रास्ते अवरुद्ध हैं,
सारी परिस्थितियां विरुद्ध हैं,
जीवन में घोर निराशा है,
कहीं नहीं आशा है,
पैर में छाले हैं,
हृदय पटल को वेधते भाले हैं,
चौतरफा उदासी है,
यहाँ दूर-दूर तक
न तो काबा है और न ही काशी  है।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

"गदहों के पास भी स्वर होता है"


               (वीर छंद)


यह दुनिया कितना  स्वरदार,स्वर से भरा समूचा मण्डल.,
एक-एक सी है आवाज, सबकी अपनी बोली-भाषा.,
ऐसी कोई नहीं है वस्तु, जिसमें उसका छिपा न स्वर हो.,
सब आपस में करते बात, एक-एक सी बातें होतीं.,
सबमें आपस में है प्रीति, सब केन्द्रित हैं इक-दूजे पर.,
स्वर में सबके रहता प्राण, यही अस्मिता का लक्षण है.,
अस्तिमान सारा भूलोक, चाहे स्थावर या जंगम हो.,
चाहे भूचर नभचर होय, अथवा हो वह जलचर प्राणी.,
सब में रहता स्वर का वास, सब अपने स्वर के स्वामी हैं.,
अपने-अपने स्वर पर दंभ, करता सारा जीव जगत है.,
सब अपने स्वर के उस्ताद, कहते फिरते लोक धरा पर.,
कोई नहीं किसी से हीन, कभी समझता है अपने को.,
सब अपने स्वर का सम्मान, करते फिरते सतत थिरकते.,
सभी मनाते हैं स्वर-पर्व, सब मस्ताने सभी निराले.,
सब में छाया हुआ उमंग, मना रहे होली दीवाली.,
गाते सब फागुन के गीत, ढोल-मजीरा लिये हाथ में.,
सब अपने स्वर के सम्राट, चींटी चीलर चील्ह चिरैया.,
ज्ञानी हो अथवा मति मंद, सबके अपने-अपने स्वर हैं.,
स्वर का मत पूछो कुछ  हाल, गदहे को भी स्वर होता है।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"

Poem -  आसान नहीं है.... 


आंगल^ होना आसान नहीं है. (फिरंगी,अंग्रेज़)
पागल   होना आसान नहीं है. 


हो सावन बिन अखियाँ सूनी, 
बादल होना आसान नहीं है. 


सूखे पत्तों पर ग़ाज़^ गिरी हो, (बिजली गिरना )
दावानल^होना आसान नहीं है. (जंगल की आग )


आँखें उसकी कितनी गहरी है, 
काजल होना आसान नहीं है. 


पोंछता कैसे विरहन के आँसू, 
आँचल होना आसान नहीं है. 


लोहे के कारोबार में "उड़ता "
साँकल बनना पड़ता है, 
कांचल^ होना आसान नहीं है. (सुनहरा,सोना)



स्वरचित मौलिक रचना. 



द्वारा -सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता"
झज्जर (हरियाणा )


संपर्क +91-9466865227


कबीर ऋषि "सिद्धार्थी"

☆मैं सिर्फ एक विचार हूँ☆
मैं कोई हिन्दी का जानकार नहीं हूँ!
न ही कोई लेखक और कवि
और न ही मैं, कोई साहित्यकार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
जो देखता हूँ, सुनता हूँ और समझता हूँ,
उसे अपनी कलम से उतार देता हूँ।
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
हाँ मुझे नफ़रत है ऐसे लोगों से,
जो इंसान को इंसान से दूर करते हैं!
मुझे शिकायत है उन सत्ताधारियों से
जो भूल जाते हैं कि वो कौन हैं?
मैं नेता या सरकार नहीं हूँ!
और न ही कोई ओहदेदार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ।
जो देखता हूँ, सुनता हूँ और समझता हूँ,
उसे अपनी कलम से उतार देता हूँ।
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
मैं कोई मीडिया या पत्रकार नहीं हूँ!
न ही किसी के हाथों की कठपुतली का तार हूँ!
और न ही कोई अख़बार हूँ!
मैं एक वफ़ादार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
मैं उनका आज विरोधी भी हूँ!
जो लोगों को जाति-धर्म का पाठ पढ़ाकर
समाज को तोड़ना जानते हैं!
सच में वो अपना स्वार्थसिद्धि चाहते हैं।
मैं न ही कोई राजा का दरबार हूँ!
और न ही कोई चाटूकार हूँ!
मैं इंसानी धर्म का प्रचार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ।
जो देखता हूँ, सुनता हूँ और समझता हूँ,
उसे अपनी कलम से उतार देता हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
मैं कोई हिन्दी का जानकार नहीं हूँ!
न ही कोई लेखक और कवि
और न ही मैं, कोई साहित्यकार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
मैं सिर्फ एक विचार हूँ!
--------★★★-------
-कबीर ऋषि "सिद्धार्थी"
सम्पर्क सूत्र- 9415911010,9455911010
पता- पण्डितपुरम प्रतापनगर बांसी, सिद्धार्थनगर उत्तर प्रदेश
पिन कोड- 272153
ईमेल- krs09415911010@gmail.com


भरत नायक "बाबूजी"

*"ग्रीष्म गहन आघात"* (दोहे)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
★तपन लगे यूँ ग्रीष्म की, पावक-तरकश-बाण।
दाघ प्रचंड निदाघ नित, मिले कहाँ पर त्राण??१??


★दहके दिनकर दीप्त-दिन, रविकर लगे प्रचंड।
राहत निशि में भी नहीं, लगती लेश न ठंड।।२।।


★सबको रहती ग्रीष्म में, पानी की ही आस।
काँटा चुभता कंठ में, बढ़ती जाती प्यास।।३।।


★जल-थल-नभ सब गर्म हैं, बढ़ा सूर्य का कोप।
चहुँदिग हाहाकार है, शीतलता का लोप।।४।।


★सूख गये सब स्रोत हैं, सूख गयी जलधार।
कारण को मत काटना, धरती करे पुकार।।५।।


★सूखे नद-नाले सभी, झुलस रहे हैं प्राण।
जीना दूभर हो रहा, पिघल पड़े पाषाण।।६।।


★सूखे नाले-कूप भी, सूखे तटिनी-ताल।
जीव जगत का ताप से, हाल हुआ बेहाल।।७।।


★तेज तपन से ग्रीष्म की, राही चले न राह।
झुलसाती जब धूप है, लगे छाँव की चाह।।८।।


★चिंतनीय है नित्य का, बढ़ता वैश्विक ताप।
मानव का निज के लिए, कर्म बना अभिशाप।।९।।


★झुलसे पौधे-पेड़ हैं, सूरज उगले आग।
समय-सबक समझो सभी, अब तो जाओ जाग।।१०।।


★लपके लपलप लू लपट, ग्रीष्म गहन आघात।
तनिक मिले राहत तभी, आये जब बरसात।।११।।


★सूझ-बूझ के साथ ही, गढ़ना भू-परिदृश्य।
मुक्ति मिलेगी ताप से, होगा सुखद भविष्य।।१२।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
भरत नायक "बाबूजी"
लोहरसिंह, रायगढ़(छ.ग.)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^


सुनीता पाठक अयोध्या

धीर धरा ने धरा बहुत, अब धरती माँ भी हुई अधीर।
 धरा  को जब तुम मां  समझोगे  तब समझोगे  उसकी पीर।।
 ऊंची ऊंची बिल्डिंग बनवा कर  सारा जंगल  काट दिया,
उपजाऊ खेतों में सड़क है मुआवजा भी बांट दिया,
 शुद्ध स्वच्छ जल वायु को छोड़ो खत्म हुई उसकी तासीर।
 धीर धरा ने धरा बहुत अब धरती  मां भी हुई अधीर।।
 जगह-जगह बनवाके बांध, नदियों का पानी रोक लिया,
 स्वीमिंग पूल भरे बोरिंग से ,भूतल का जल सोख लिया,
 सूखा और अकाल पड़ा तो ,गिरा है अब नैनो से नीर।
 धीर धरा ने धरा बहुत अब धरती  मां भी हुई अधीर।।
फल और फूल अनाज व मेवा सब था इंसानों के लिए,
 साहस ,ताकत ,ज्ञान ,विवेक यह प्रकृति ने सब कुछ हमें दिए,
 निरीह पशु पक्षी भक्षण हित ,चला रहे हैं उन पर तीर।
 धीर धरा ने धरा बहुत अब धरती  मां भी हुई अधीर।।
यह प्रकृति का बदला है, जो मनुज मनुज से दूर हुआ,
 जो आजाद था, वह कैद में रहने को मजबूर हुआ,
दूर आदमी मानवता से कैसे बदलेगी तस्वीर।
 धीर धरा ने धरा बहुत अब  धरती  मां भी हुई अधीर।।


सुनीता पाठक अयोध्या


भरत नायक "बाबूजी"

*"धरती"* (दोहे)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
■जननी जीवों की धरा, जीवन का आधार।
रत्नों की यह खान है, खुशियों का भंडार।।१।।


■रूप सलोना है सजा, रत्नाकर-वन-शैल।
भेदभाव भरना नहीं, रखना मत मन-मैल।।२।।


■धरती धरती गर्भ में, अनमिट-अर्थ अनेक।
पानी-पवन प्रदायिनी, कर न मनुज अतिरेक।।३।।


■आश्रय जैविक-जान बन, धरा करे उपकार।
पोषण धरती से मिले, होता जग-उद्धार।।४।।


■महक उठे मह-मह धरा, पल्लव-तरु नव-भोर।
नदिया नानिद नाद नित, द्विजगण करते शोर।।५।।


■शृंगारित मदमस्त महि, गगन रहा है झूम।
वाहित पुष्प-पराग-पथ, अलिगन कलियन चूम।।६।।


■गढ़-मढ़ लो आकार कुछ, धरती करे न क्रोध।
मानव-मनमानी लगे, दानवपन-दुर्बोध।।७।।


■ ममता का मंदिर धरा, जग पालन प्रतिमान।
धरती की पूजा करो, पालनहारी जान।।८।।


■दुःख हरे सुखदायिनी, धन्य धरा धन-धाम।
जलचर-थलचर-व्योमचर, करें सभी विश्राम।।९।।


■आह्लादित करती धरा, गाकर नदिया गीत।
लहरे धानी चुनरिया, प्रीति पगे नवनीत।।१०।।


■दूषित मत करना कभी, धरती का शुचि गात।
जीव-जगत परिपोषिता, सौम्य-सृष्टि-सौगात।।११।।


■सलिल-मृदा-अंबर-अनल, मारुत जग-संचार।
निशिवासर आवागमन, लोक-लोक-संचार।।१२।।


■शैल बना प्रहरी धरा, सागर धोता पाद।
धरती की सानी नहीं, हरपल दे आह्लाद।।१३।।


■सकल सहे प्रतिरोध महि, करती है संघर्ष।
फिर भी झोली भू भरे, सबको देती हर्ष।।१४।।


■संरक्षित करना मृदा, शुद्ध रहे परिवेश।
पूरित हो धन-धान्य से, विकसे अपना देश।।१५।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
भरत नायक "बाबूजी"
लोहरसिंह, रायगढ़(छ.ग.)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^


सीता नवमी आशुकवि नीरज अवस्थी दोहे

मां जगतजननी सीता जी के प्राकट्य दिवस सीता नवमी पर चंद दोहे।


धरती जननी जानकी,धरती सबकी मात।
धरती से हम सब जने,धरती से ही नात।
जगति जननि मां जानकी,जनक सुता विख्यात।
मां धरती की गोद से,प्रगटी सीता मातु।
शुक्ल पक्ष वैशाख तिथि सीता नवमी आज ।
नीरज पर करिए कृपा सीता कौशलराज।
त्रेता में जैसे भरी , मिथिला पति की गोद।
हर दम्पति को ईश दो,सुंदर शिशू अबोध।
सीता राघव राम जी हम सबके आदर्श।
हर घर मे लव कुश पले जीवन मे हो हर्ष।।
आशुकवि नीरज अवस्थी 9919256950


Featured Post

दयानन्द त्रिपाठी निराला

पहले मन के रावण को मारो....... भले  राम  ने  विजय   है  पायी,  तथाकथित रावण से पहले मन के रावण को मारो।। घूम  रहे  हैं  पात्र  सभी   अब, लगे...