आशुकवि नीरज अवस्थी समान सौ बरस का आशाओं का हुआ खात्मा

 समान सौ बरस का पल की खबर नहीं है बिल्कुल सच है नील गगन में उड़ने वाले धरती को पहचान,किसी का रहा नही अभिमान इस नश्वर संसार में कुछ भी नहीं रहने वाला कल क्या होगा कोई नहीं जानता पल में पल से पल में क्या हो जाए मानव तेरे शरीर का कुछ पता नहीं तकदीर का बहुत से भजन चेतावनी द्वारा समय-समय पर विद्वानों ने समाज को उद्बोधन कराया है । आशाओं का हुआ खात्मा दिल की तमन्ना बनी रही , जब परदेसी हुआ रवाना सुंदर काया पड़ी रही हम कितना मजबूर होते हैं समय-समय पर बहुत से काम ऐसे होते हैं जो हम न चाहते हुए भी करते हैं और बहुत से काम ऐसे होते हैं जिनको चाहते हुए भी नहीं कर पाते हैं आपके हाथ में कुछ भी नहीं है और वास्तव में वह परम सत्ता दुनिया बनाना और बनाके फिर चलाना बस उसी का काम है, बड़ा जोरदार जिसका इंतजाम है इसलिए ऐसा नहीं है कि हम किसी भी चीज का संचय न करें क्योंकि जब तक जीवन है तब तक आवश्यकताएं है और उन की पूर्ति के लिए संसाधनों का भी प्रयोग अति आवश्यक है ।किंतु अगर हमारे पास में कोई संसाधन है और किसी व्यक्ति को उसकी आवश्यकता है तो उसकी पूर्ति हमें करनी चाहिए क्योंकि आपकी सहभागिता बहुत जरूरी है । *जब हम नहीं होते हैं तब चार कंधों की आवश्यकता पड़ती है वह किसी दूसरे के ही होते हैं* इसलिए किसी भी चीज के ऊपर गुमान नहीं करना चाहिए और उस परम सत्ता के प्रति सदैव तन मन धन वचन कर्म से समर्पित रहना चाहिए यह हमारे व्यक्तिगत विचार हैं आशा है आप लोग पसंद भी करेंगे।
 धन्यवाद
 आशु कवि नीरज अवस्थी खमरिया पंडित खीरी


कोई टिप्पणी नहीं:

Featured Post

दयानन्द त्रिपाठी निराला

पहले मन के रावण को मारो....... भले  राम  ने  विजय   है  पायी,  तथाकथित रावण से पहले मन के रावण को मारो।। घूम  रहे  हैं  पात्र  सभी   अब, लगे...