डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी

"दृष्टि मेँ स्व बैठा है"


बिना अवलोकन  के संकलन नहीं हो सकता है,
बिना संकलन के संरचन नहीं हो सकता है,
हम जो देखते हैं, वही बनते हैं,
दोष देखनेवाले, दोष का ही संग्रहण करते हैं,
वैसा ही हो जाते हैं,
समाज में उपहास का पात्र बन जाते हैं,
लोग हेय दृष्टि से देखने लगते हैं,
गुण और अवगुण सर्वत्र विखरे हैं,
क्यों नहीं हम गुण का संकलन करते हैं ?
दोष देखकर क्यों दूषित बनते हैं?
हम दृष्टि हैं,
स्व की वृष्टि हैं।
आइये सुन्दर स्व का निर्माण करें,
उत्तम पुरुष को प्रणाम करें।
खुद की बुराई और दूसरों की अच्छाई देखें,
विश्व की भलाई करें।
इसी तरह से रहना सीखें,
सौहार्द का वातावरण बुनना सीखो,
दूब की तरह जमना सीखो,
अम्रुत कलश ले चलना सीखो,
अपने भीतर के सौंदर्य को चुनना सीखो,
पुरुषोत्तम की बस्ती में बैठना सीखो,
चाहो तो बन सकते हो,
स्व का अमर इतिहास गढ़ सकते हो,
अच्छा बनकर बना सकते हो,
कलुषित कालिमा को मिटा सकते हो।
अच्छा देखो
सुन्दर बनो
उत्तन रचो।
यही अभीष्ट है,
अंतस में बैठा इक मदनमोहन इष्ट है।


रचनाकार:


डॉ०रामबली मिश्र हरिहरपुरी
9838453801


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