हलधर

मुक्तिका (ग़ज़ल)
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बाहर  सन्नाटा  पसरा  है  अंदर  अंदर  शोर क्यों ।
साहूकार जिसे माना था वो ही निकला चोर क्यों ?


तन से साफ दिखाई देता मैन में जिसके मैल है ,
देह रूप से दिखे देवता अंतस आदम खोर क्यों ?


सहज सरल दिखलाई देता है पक्का शैतान वो ,
मज़हब का चोला पहने ये आतंकी घनघोर क्यों ?


मेरी कविता को पढ़कर क्यों खड़े हो गये कान जी ।
सबसे कम अनुभव वाला ही नेता रोम किशोर क्यों ?


नंदी की पीछे पीछे ज्यों  दौड़ा  भूखा  सिंह जी ,
मैया के वाहन से बोलो शिव वाहन कमजोर क्यों ?


बैठे बैठे कविता लिख दी घर अपने ही का कैद हैं ,
हलधर "की कविता से पाठक होंवें भाव विभोर क्यों ?


         हलधर -9897346173


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