डॉ0 हरि नाथ मिश्र

*दोहे*
कृपा-सिंधु प्रभु राम की,रहती कृपा असीम।
हरे कष्ट निज भक्त का,सुमिरन राम- रहीम।।

अथक परिश्रम से बने, देखो रंक नरेश।
कृपा करें श्रम-भक्त पर, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।।

अटल रहे विश्वास यदि, पत्थर हो भगवान।
श्रद्धा होती फलवती,प्रभु की कृपा महान।।

प्रभु की लीला अकथ है,महिमा नाथ अपार।
दुष्ट-दलन के हेतु प्रभु, जग में लें अवतार।।

अनल-पवन-क्षिति-नीर-नभ,पंच-भूत ये तत्त्व।
इनसे ही निर्मित जगत, इनका परम महत्त्व।।

संत-कथन उत्तम सदा ,उसमें रख विश्वास।
उसको देता परम सुख ,मन जो रहे उदास।।

अटल-अमिट रवि-शशि-किरण,लिए तेज प्रभु राम।
रामचंद्र रवि - वंश के , एक मात्र सुख - धाम।।
                ©डॉ0हरि नाथ मिश्र
                    9919446372



(हनुमत वंदन)
हनुमत वंदन सब करें,निश्चित हो कल्याण।
हरें कष्ट हनुमान जी, कहते वेद - पुराण।।

राम-भक्त हनुमान जी,हैं अंजनि के लाल।
लाल सूर्य को देखकर,गए लील रवि बाल।।

रावण की लंका जला, लिए सीय को खोज।
संकट को काटें वही,यदि हो सुमिरन रोज।।

पवन-पुत्र हनुमान जी, को पूजे संसार।
इनके पूजन मात्र से, होता रिपु-संहार।।

बल-पौरुष देते यही, हरते बुद्धि-विकार।
हनुमत वंदन से मिले,मन को हर्ष अपार।।

इनके ही उर में बसे, राम-सीय का रूप।
धन्य-धन्य हे पवन-सुत,सेवक राम अनूप।।

लाल अंजनी की करें, सब जन मिल जयकार।
अर्चन-पूजन साथ में, तजकर सब तकरार।।
              ©डॉ0हरि नाथ मिश्र
                   9919446372

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